मोतिहारी के सरकारी स्कूलों में अब मचेगा शोर! खेल सामग्री के लिए ₹25,000 तक का बजट जारी; डीपीओ प्रहलाद गुप्ता ने प्रिंसिपलों को सौंपी बड़ी जिम्मेदारी

HIGHLIGHTS

  • बड़ा एक्शन: बिहार राज्य खेल प्राधिकरण की पहल पर मोतिहारी के सभी सरकारी स्कूलों को मिलेगी खेल किट।
  • बजट का आवंटन: प्राइमरी को ₹5,000, मिडिल को ₹10,000 और हाई स्कूलों को ₹25,000 की राशि स्वीकृत।
  • प्रिंसिपलों पर भरोसा: समग्र शिक्षा बजट 2025-26 के तहत खरीदारी की पूरी कमान विद्यालय के प्रधान को।
  • क्वालिटी चेक: डीपीओ का सख्त आदेश— “सामग्री की गुणवत्ता में कमी मिली तो खैर नहीं।”

मोतिहारी (पूर्वी चंपारण) | 14 मार्च, 2026 : चंपारण के सरकारी स्कूलों की सूरत अब बदलने वाली है। क्लासरूम की पढ़ाई के साथ-साथ अब खेल के मैदानों में भी ‘गोल्ड’ लाने की तैयारी शुरू हो गई है। बिहार सरकार ने एक बड़ी योजना के तहत मोतिहारी के सभी प्राथमिक, मध्य और उच्च माध्यमिक विद्यालयों के बच्चों के लिए खेल सामग्री खरीदने का रास्ता साफ कर दिया है। मकसद साफ है—सरकारी स्कूल का बच्चा भी खेल की दुनिया में किसी से पीछे न रहे।

​शिक्षा विभाग के जिला कार्यक्रम पदाधिकारी (DPO) प्रहलाद गुप्ता ने बताया कि सरकार खेल के प्रति बच्चों का उत्साह बढ़ाने के लिए मिशन मोड में काम कर रही है। समग्र शिक्षा वार्षिक कार्य योजना बजट 2025-26 के तहत जिले के सभी विद्यालयों के प्राचार्यों को खेल सामग्री खरीदने की जिम्मेदारी दी गई है। यह कदम इसलिए उठाया गया है ताकि स्थानीय स्तर पर बच्चों की जरूरत और रुचि के हिसाब से बेहतर उपकरण खरीदे जा सकें।

बजट का पूरा गणित:

सरकार ने स्कूलों की श्रेणी के हिसाब से फंड का निर्धारण किया है, ताकि हर स्तर पर खेल को बढ़ावा मिले:

  1. प्राथमिक विद्यालय: प्रति स्कूल ₹5,000 की राशि।
  2. उच्च प्राथमिक/मध्य विद्यालय: प्रति स्कूल ₹10,000 की राशि।
  3. माध्यमिक/उच्चतर माध्यमिक विद्यालय: प्रति स्कूल ₹25,000 की राशि।

​डीपीओ प्रहलाद गुप्ता ने साफ लफ्जों में चेतावनी दी है कि खरीदे जाने वाले खेल उपकरण पूरी तरह से गुणवत्तापूर्ण होने चाहिए। सरकार की सोच है कि सरकारी स्कूल के बच्चे शिक्षा के साथ-साथ खेलों में भी अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाएं और राज्य व राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाएं।

VOB का नजरिया

​मोतिहारी जैसे जिले में जहाँ प्रतिभाओं की कमी नहीं है, वहां सरकार की यह पहल ‘संजीवनी’ का काम करेगी। अक्सर देखा जाता है कि खेल के प्रति जुनून होने के बावजूद बच्चों के पास सही बॉल, बैट या नेट नहीं होता। हालांकि, यहाँ सबसे बड़ा सवाल ‘ईमानदारी’ का है। क्या ₹25,000 का सामान वाकई मैदान पर दिखेगा या फाइलों में ‘गुणवत्तापूर्ण’ बनकर रह जाएगा? प्राचार्यों को यह समझना होगा कि ये पैसे केवल सामान खरीदने के लिए नहीं, बल्कि बच्चों के सपनों को उड़ान देने के लिए हैं। प्रशासन को समय-समय पर फिजिकल वेरिफिकेशन करना होगा ताकि यह योजना केवल ‘खरीदारी’ तक सीमित न रहे।

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