HIGHLIGHTS:
- बड़ा हादसा: परवलपुर के जयशिव बिगहा आंगनवाड़ी केंद्र में छत का निचला हिस्सा गिरने से मची अफरा-तफरी।
- मासूम घायल: आधा दर्जन बच्चे लहूलुहान, एक बच्चे का टूटा पैर; निजी क्लीनिक में चल रहा इलाज।
- भ्रष्टाचार की बू: महज एक साल पहले ₹77,000 की लागत से हुई थी मरम्मत, पहली बारिश/झटके में ही खुली पोल।
- जनता का आक्रोश: “भ्रष्ट इंजीनियरों और ठेकेदारों पर हो FIR,” ग्रामीणों ने प्रशासन के खिलाफ खोला मोर्चा।
अक्षरों की जगह गिरा ‘मौत’ का मलबा: पढ़ाई के बीच चीख-पुकार
नालंदा: बिहार के नालंदा जिले से एक दिल दहला देने वाली खबर सामने आई है, जहाँ बच्चों के भविष्य संवारने वाले आंगनवाड़ी केंद्र की छत उनके लिए काल बन गई। परवलपुर प्रखंड के जयशिव बिगहा स्थित आंगनवाड़ी केंद्र संख्या-6 में गुरुवार को जब मासूम बच्चे पढ़ाई में मशगूल थे, तभी अचानक छत का पलस्तर (निचला हिस्सा) भरभरा कर उनके ऊपर गिर गया। पल भर में क्लासरूम ‘कब्रगाह’ जैसा दिखने लगा और बच्चों की चीखों से पूरा इलाका दहल गया।
[हादसे का ‘प्रोग्रेस कार्ड’: कौन कितना घायल?]
परिजनों और ग्रामीणों ने तत्परता दिखाते हुए मलबे में दबे बच्चों को बाहर निकाला और तुरंत एकंगरसराय के एक निजी क्लीनिक में भर्ती कराया।
77 हजार की ‘मरम्मत’ या सरकारी धन की बंदरबांट?
इस हादसे ने नीतीश सरकार के ‘भ्रष्टाचार मुक्त’ दावों की पोल खोल दी है। आंगनवाड़ी सेविका शशीलता ने चौंकाने वाला खुलासा किया:
”सिर्फ एक साल पहले इस केंद्र की मरम्मत के लिए 77,000 रुपये खर्च किए गए थे। नई मरम्मत के बावजूद छत का गिरना साफ बताता है कि काम में घटिया सामग्री का इस्तेमाल हुआ है।”
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पीड़ित बच्चा |
चोट का प्रकार |
स्थिति |
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आकाश कुमार |
पैर की हड्डी टूटी (Fracture) और सिर में चोट |
गंभीर लेकिन स्थिर |
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अन्य 5 बच्चे |
सिर, हाथ और शरीर पर गहरी चोटें |
खतरे से बाहर |
ग्रामीणों की चेतावनी: “बच्चों की जान से खिलवाड़ बंद करो”
घटना के बाद जयशिव बिगहा गांव में भारी तनाव और नाराजगी है। अभिभावकों का कहना है कि अगर बच्चों को कुछ हो जाता, तो इसका जिम्मेदार कौन होता? ग्रामीणों ने जिलाधिकारी (DM) से मांग की है कि:
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- मरम्मत करने वाले ठेकेदार और जूनियर इंजीनियर पर FIR दर्ज हो।
- जिले के सभी जर्जर आंगनवाड़ी और स्कूल भवनों का तुरंत सेफ्टी ऑडिट कराया जाए।
- घायल बच्चों के इलाज का पूरा खर्च और मुआवजा सरकार दे।
VOB का नजरिया: क्या मासूमों के खून से भरी जाएगी कमीशन की जेब?
नालंदा की यह घटना महज एक इत्तेफाक नहीं, बल्कि ‘सिस्टम’ के भ्रष्टाचार का जीता-जागता उदाहरण है। 77 हजार रुपये में हुई मरम्मत एक साल भी नहीं टिकी, यह इंजीनियरिंग का कौन सा नमूना है? जब तक ऐसे ‘कागजी विकास’ करने वाले अधिकारियों को सलाखों के पीछे नहीं भेजा जाएगा, तब तक बिहार के नौनिहाल ऐसे ही असुरक्षित भवनों में अपनी जान जोखिम में डालकर ‘क ख ग’ सीखते रहेंगे।


