सहरसा और किशनगंज की धरती ने उगला ‘प्राचीन इतिहास’! खुदाई में मिलीं भगवान गणेश और विष्णु की दुर्लभ मूर्तियां; पुरातत्व प्रेमियों की उमड़ी भीड़

HIGHLIGHTS:

  • सहरसा: बाबा मटेश्वर धाम के पास खेत में मिलीं भगवान गणेश की दुर्लभ प्रतिमा।
  • किशनगंज: बहादुरगंज में काले पत्थर से तराशी गई भगवान विष्णु की प्राचीन मूर्ति बरामद।
  • इतिहास: विशेषज्ञों का मानना— पाल वंश या उससे भी पुरानी हो सकती हैं ये कलाकृतियां।

सहरसा: मटेश्वर धाम की शिवगंगा के पास ‘गणेश’ का प्रकटीकरण

सहरसा: बिहार की धरती के गर्भ में न जाने कितने ऐतिहासिक रहस्य छिपे हैं। सहरसा के सिमरी बख्तियारपुर प्रखंड स्थित कांठो पंचायत में एक बार फिर इसका प्रमाण मिला है। प्रसिद्ध बाबा मटेश्वर धाम मंदिर से महज 100 मीटर की दूरी पर शिवगंगा के समीप, सीताराम यादव के पुत्र रंधीर यादव के खेत में खुदाई चल रही थी। तभी मिट्टी के नीचे से भगवान गणेश की एक प्राचीन और अत्यंत दुर्लभ प्रतिमा निकली।

  • भक्तों का तांता: जैसे ही यह खबर फैली, आसपास के गांवों से लोग दर्शन के लिए उमड़ पड़े।
  • धार्मिक महत्व: मटेश्वर धाम पहले से ही आस्था का बड़ा केंद्र है, ऐसे में गणेश प्रतिमा का मिलना श्रद्धालुओं के लिए किसी चमत्कार से कम नहीं है।

किशनगंज: काले पत्थर में तराशा गया ‘वैकुंठ’ का वैभव

किशनगंज: दूसरी ओर, किशनगंज के बहादुरगंज थाना क्षेत्र अंतर्गत सरंडा में भी धरती ने अपना खजाना खोला है। सोमवार की शाम मिट्टी की खुदाई के दौरान जमीन के अंदर दबी एक दिव्य प्रतिमा मिली।

  • कलाकृति: यह मूर्ति भगवान विष्णु की है, जिसे काले पत्थर (Black Stone) पर बेहद खूबसूरती से तराशा गया है।
  • संरक्षण: ग्रामीणों ने इसकी सूचना तुरंत स्थानीय प्रशासन को दी। पुलिस ने मौके पर पहुंचकर स्थिति का जायजा लिया। काले पत्थर की यह चमक और नक्काशी पाल कालीन मूर्तिकला की याद दिलाती है।

[खुदाई में मिला ‘इतिहास’ – एक नजर में]

स्थान

जिला

प्रतिमा

सामग्री/विशेषता

कांठो पंचायत

सहरसा

भगवान गणेश

प्राचीन, दुर्लभ मिट्टी/पत्थर

सरंडा (बहादुरगंज)

किशनगंज

भगवान विष्णु

तराशा हुआ काला पत्थर

पुरातत्व विभाग को सूचना: क्या खुलेंगे नए राज?

​स्थानीय बुद्धिजीवियों और इतिहास के जानकारों का कहना है कि कोसी और सीमांचल का यह इलाका प्राचीन काल में कला और संस्कृति का गढ़ रहा है।

    • पाल काल की झलक: बिहार में इस तरह की काले पत्थर की मूर्तियां अक्सर 8वीं से 12वीं शताब्दी (पाल काल) के दौरान की पाई जाती हैं।
    • जांच की मांग: लोगों ने मांग की है कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की टीम इन मूर्तियों की कार्बन डेटिंग और जांच करे, ताकि इनके सही कालखंड का पता चल सके।

VOB का नजरिया: विरासत को सहेजने की जरूरत!

सहरसा और किशनगंज में इन मूर्तियों का मिलना महज इत्तेफाक नहीं है। यह बिहार की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का प्रमाण है। अक्सर ऐसी मूर्तियां मिलने के बाद स्थानीय स्तर पर मंदिर तो बन जाते हैं, लेकिन उनका ऐतिहासिक संरक्षण (Historical Preservation) नहीं हो पाता। प्रशासन को चाहिए कि इन स्थलों को चिन्हित कर खुदाई की संभावनाओं को तलाशे, ताकि बिहार के छिपे हुए इतिहास को दुनिया के सामने लाया जा सके।

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