हक की लड़ाई! भागलपुर में सड़कों पर उतरे बिहार के सारथी; DM कार्यालय पर प्रदर्शन कर मांगी 20 लाख की बीमा पॉलिसी और पेंशन

बिहार की लाइफलाइन कहे जाने वाले चालकों ने अब अपने अधिकारों के लिए ‘स्टेयरिंग’ छोड़कर ‘आवाज’ बुलंद करना शुरू कर दिया है। सोमवार को बिहार ड्राइवर एसोसिएशन के बैनर तले सैकड़ों चालकों ने भागलपुर जिलाधिकारी (DM) कार्यालय पर जोरदार प्रदर्शन किया। अपनी 10 सूत्री मांगों को लेकर डटे इन ड्राइवरों ने स्पष्ट कर दिया है कि अगर उनकी अनदेखी जारी रही, तो आने वाले दिनों में चक्का पूरी तरह जाम हो सकता है।

उपेक्षा के खिलाफ 10 सूत्री ‘हुंकार’

​एसोसिएशन के सदस्यों का कहना है कि वे दिन-रात सड़कों पर रहकर अर्थव्यवस्था और समाज का चक्का चलाते हैं, लेकिन जब उनकी सुरक्षा और भविष्य की बात आती है, तो सरकार और समाज दोनों मौन हो जाते हैं।

प्रदर्शन के दौरान उठाई गई प्रमुख मांगें:

  • सामाजिक सुरक्षा और पेंशन: चालकों के लिए बुढ़ापे में सम्मानजनक जीवन के लिए पेंशन योजना लागू की जाए।
  • ड्राइवर वेलफेयर फंड: एक विशेष फंड का गठन हो जिससे मुश्किल वक्त में चालकों और उनके परिवारों को आर्थिक मदद मिल सके।
  • 20 लाख का मुआवजा: सड़क दुर्घटना में किसी चालक की मृत्यु होने पर उसके आश्रितों को कम से कम 20 लाख रुपये का मुआवजा दिया जाए।
  • बीमा पॉलिसी: सभी कमर्शियल ड्राइवरों के लिए अनिवार्य और मुफ्त स्वास्थ्य एवं जीवन बीमा की व्यवस्था हो।

DM को सौंपा ज्ञापन: “इंतजार की भी सीमा है”

​प्रदर्शन के बाद एसोसिएशन के प्रतिनिधियों ने भागलपुर जिलाधिकारी को अपनी मांगों से संबंधित एक विस्तृत ज्ञापन सौंपा। चालकों ने भारी मन से कहा कि वे केवल आश्वासन नहीं, बल्कि धरातल पर कार्रवाई चाहते हैं।

​एसोसिएशन के पदाधिकारियों ने चेतावनी देते हुए कहा, “हम समाज के सेवक हैं, लेकिन हमारी बेबसी का फायदा उठाया जा रहा है। अगर जिला प्रशासन और राज्य सरकार ने हमारी मांगों पर जल्द ही सकारात्मक रुख नहीं अपनाया, तो यह आंदोलन भागलपुर से निकलकर पूरे बिहार में आग की तरह फैलेगा।”

VOB का नजरिया: क्या ‘ड्राइवर’ केवल वोट बैंक हैं?

अक्सर सड़क हादसों में सबसे पहले गाज ड्राइवर पर गिरती है, लेकिन उनकी सुरक्षा और भलाई के लिए बने कानून कागजों तक सीमित रह जाते हैं। भागलपुर में आज जो भीड़ दिखी, वह केवल ड्राइवरों की नहीं, बल्कि उनके घर के उन चूल्हों की चिंता थी जो किसी हादसे के बाद हमेशा के लिए बुझ जाते हैं। 20 लाख के मुआवजे और पेंशन की मांग कोई विलासिता नहीं, बल्कि एक बुनियादी जरूरत है। अब देखना यह है कि प्रशासन इस ‘ज्ञापन’ को केवल रद्दी की टोकरी में डालता है या वाकई इनके जीवन में बदलाव की कोई ‘हेडलाइट’ जलती है।

  • Related Posts

    पूर्णिया भाजपा में बड़ा संगठनात्मक बदलाव, संजीव सिंह को सौंपी गई कार्यकारी जिलाध्यक्ष की जिम्मेदारी

    Share Add as a preferred…

    Continue reading