
खबर के मुख्य बिंदु (Highlights):
- अनोखा रंग: भागलपुर के वार्ड नंबर 1 (लालूचक) में पारंपरिक अंदाज में मनाई गई होली।
- देसी धुन: डीजे के शोर को छोड़, ढोलक और झाल की थाप पर हुआ सामूहिक ‘होली गायन’।
- संस्कृति: नगर निगम क्षेत्र में होने के बावजूद मोहल्ले ने संजो रखी है अपनी ग्रामीण और कृषि प्रधान पहचान।
- एकता का संदेश: बुजुर्ग, युवा और बच्चों ने एक साथ गुलाल उड़ाकर दी भाईचारे की मिसाल।
भागलपुर: जहां आज के दौर में त्योहारों का मतलब कानफोड़ू डीजे और शोर-शराबा होता जा रहा है, वहीं भागलपुर शहर के वार्ड नंबर 1 स्थित लालूचक मोहल्ले ने एक अलग ही मिसाल पेश की है। यहाँ की होली में न केवल रंगों की बौछार थी, बल्कि बिहार की सोंधी मिट्टी और पुरानी परंपराओं की महक भी साफ महसूस की गई। नगर निगम के दायरे में आने वाले इस इलाके ने साबित कर दिया कि आधुनिकता के बीच अपनी जड़ों को कैसे जिंदा रखा जाता है।
ढोलक-झाल और ‘जोगिरा सारा रारा’ की गूँज
लालूचक में इस बार होली का नजारा किसी सुदूर गांव जैसा था। युवाओं की टोली ने ढोलक और झाल उठाकर जब पारंपरिक फाग और होली गीत गाना शुरू किया, तो पूरा मोहल्ला भक्तिमय और उत्साह से भर उठा।
- सामूहिकता: यहाँ होली केवल परिवार तक सीमित नहीं रही, बल्कि पूरा मोहल्ला एक आंगन की तरह नजर आया।
- विरासत: बुजुर्गों ने युवाओं को पुरानी पीढ़ी के गीत सिखाए, जिससे यह पर्व सांस्कृतिक विरासत को अगली पीढ़ी को सौंपने का जरिया बन गया।
शहर में ‘गांव’ वाली वो खास बात
लालूचक मोहल्ले की पहचान आज भी अपनी कृषि संस्कृति और पारंपरिक मूल्यों से जुड़ी हुई है।
”भारत आज भी गांवों का देश है। भले ही हम कागजों पर नगर निगम का हिस्सा बन गए हैं, लेकिन हमारा दिल आज भी अपनी लोक-संस्कृति के लिए धड़कता है।” — स्थानीय निवासी
होली के रंग में रंगे ‘सितारे’
इस खास आयोजन में मोहल्ले के हर वर्ग की भागीदारी रही। उत्सव में प्रमुख रूप से:
रंगकर्मी कपिल देव रंग, सुनील कुमार मंडल, अरविंद मंडल, विजय कुमार, सागर कुमार, हंसलाल मंडल, संजीव कुमार और लूटन मंडल ने नेतृत्व किया। वहीं, आधी आबादी ने भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया, जिनमें काजल कुमारी, श्वेता कुमारी, सोनाक्षी कुमारी, कोमल कुमारी, प्रतिमा कुमारी और स्नेह लता कुमारी सहित दर्जनों युवा-युवतियां शामिल रहीं।
VOB का नजरिया: असली रंग तो ‘संस्कार’ का है
लालूचक की यह होली हमें याद दिलाती है कि त्योहार केवल छुट्टी मनाने का बहाना नहीं, बल्कि अपनी जड़ों की ओर लौटने का रास्ता है। जिस तरह से यहाँ के लोगों ने अपनी सांस्कृतिक पहचान को संजोया है, वह उन शहरी इलाकों के लिए एक सबक है जो अपनी परंपराओं को भूलते जा रहे हैं। ‘द वॉयस ऑफ बिहार’ ऐसी सामूहिकता और प्रेम को सलाम करता है।


