Bhagalpur Holi 2026: सुल्तानपुर के रघुचक में ‘जोगिरा’ की गूँज! ढोल-मंजीरे की थाप पर जमकर थिरके ग्रामीण; भाईचारे के रंगों में सराबोर हुआ अंग क्षेत्र

खबर के मुख्य बिंदु (Highlights):

  • फागुनी मस्ती: भागलपुर में रंगों के त्योहार होली का उत्साह चरम पर, सुल्तानगंज में दिखा अनूठा नजारा।
  • परंपरा: रघुचक अन्नहार गांव में कीर्तन-भजन के बाद प्रज्वलित हुई ‘होलिका की अग्नि’।
  • जुगलबंदी: ढोल, झाल और मंजीरे की थाप पर युवाओं और बुजुर्गों ने लगाए ठुमके।
  • संदेश: “रंगों से बड़ा भाईचारा”— ग्रामीणों ने पेश की एकता की मिसाल।

भागलपुर: अंग प्रदेश की धरती पर फागुन की बयार ऐसी चली है कि हर कोई ‘जोगिरा सारा रा रा’ के रंग में डूबा नजर आ रहा है। भागलपुर जिले के शहरी इलाकों से लेकर सुदूर देहातों तक, होली का उत्साह सिर चढ़कर बोल रहा है। सोमवार देर रात होलिका दहन के साथ ही उत्सव का औपचारिक आगाज हो गया, जहाँ परंपराओं और लोकगीतों के संगम ने माहौल को उत्सवमय बना दिया।

रघुचक अन्नहार में ‘देसी’ होली का जलवा

​भागलपुर के सुल्तानगंज प्रखंड अंतर्गत रघुचक अन्नहार गांव से होली के उल्लास की खूबसूरत तस्वीरें सामने आई हैं। यहाँ के ग्रामीणों ने दिखा दिया कि आज के डिजिटल युग में भी पारंपरिक होली का मजा कुछ और ही है।

  • भजन-कीर्तन: होलिका दहन से पहले ग्रामीणों ने सामूहिक रूप से भजन-कीर्तन कर भगवान को याद किया।
  • सामूहिक उत्सव: पूरा गांव एक जगह इकट्ठा हुआ और पारंपरिक लोकगीतों की धुन पर देर रात तक जश्न मनाया।

ढोल-मंजीरे की थाप और थिरकते कदम

​गांव की चौपाल पर जब ढोल, झाल और मंजीरे बजने शुरू हुए, तो क्या युवा और क्या बुजुर्ग, सभी अपनी उम्र भूलकर थिरकने लगे।

  • लोक संगीत: अंगिका और भोजपुरी के पारंपरिक होली गीतों ने समां बांध दिया।
  • सद्भाव: ग्रामीणों का कहना है कि यह केवल रंगों का खेल नहीं है, बल्कि यह वह समय है जब पुराने गिले-शिकवे भूलकर लोग गले मिलते हैं।

“भाईचारा ही असली रंग है”

​रघुचक अन्नहार के ग्रामीणों ने ‘द वॉयस ऑफ बिहार’ से बात करते हुए बताया कि उनके गांव में पीढ़ियों से इसी तरह सामूहिक होली मनाने की परंपरा रही है। यह आयोजन गांव की एकता को और मजबूत करता है। शहरी भागदौड़ से दूर, यहाँ की होली में मिट्टी की सोंधी खुशबू और अपनों का साथ सबसे बड़ा ‘गुलाल’ बनकर उभर रहा है।

VOB का नजरिया: विरासत को संजोता ग्रामीण बिहार

​अक्सर शहरों में डीजे और लाउड म्यूजिक के शोर में पारंपरिक वाद्य यंत्र कहीं खो जाते हैं, लेकिन सुल्तानगंज के रघुचक जैसे गांव आज भी हमारी सांस्कृतिक विरासत को जिंदा रखे हुए हैं। ढोल और मंजीरे की थाप ही असली होली की पहचान है। ‘द वॉयस ऑफ बिहार’ की ओर से आप सभी को रंगों के इस महापर्व की हार्दिक शुभकामनाएं!

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