
रियाद/दुबई: मिडिल ईस्ट में जारी संघर्ष अब वैश्विक अर्थव्यवस्था को सीधे प्रभावित करने लगा है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, ईरान ने सऊदी अरब की सरकारी तेल कंपनी Saudi Aramco की प्रमुख तेल सुविधाओं में से एक ‘रास तनुरा’ रिफाइनरी पर ड्रोन हमला किया है। एहतियात के तौर पर रिफाइनरी को अस्थायी रूप से बंद कर दिया गया है।
अरामको अधिकारियों के मुताबिक हालात नियंत्रण में हैं, लेकिन सुरक्षा कारणों से परिचालन रोकना जरूरी समझा गया। खबर फैलते ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमतों में 9.32% की तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई, जिससे ऊर्जा बाजार में हड़कंप मच गया है।
होर्मुज स्ट्रेट में संकट गहराया
तनाव का सबसे बड़ा असर Strait of Hormuz पर देखा जा रहा है, जहां से दुनिया का लगभग 20% कच्चा तेल गुजरता है। हालांकि ईरान ने आधिकारिक रूप से इस समुद्री मार्ग को बंद करने की घोषणा नहीं की है, लेकिन युद्ध के खतरे के कारण कई शिपिंग कंपनियों ने आवाजाही सीमित कर दी है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह बाधा लंबी चली, तो पेट्रोल और डीजल की कीमतों में वैश्विक स्तर पर रिकॉर्ड बढ़ोतरी हो सकती है। पिछले चार वर्षों में कच्चे तेल की कीमतों में यह सबसे बड़ी तेजी बताई जा रही है।
अमेरिकी-इजरायली हमले के बाद बढ़ा टकराव
तनाव की शुरुआत उस समय हुई जब United States और Israel ने ईरान के कई ठिकानों पर मिसाइल हमले किए। इन हमलों में ईरान के सुप्रीम लीडर Ali Khamenei के मारे जाने की खबर सामने आई। इसके बाद तेहरान ने बदले की कार्रवाई तेज कर दी।
ईरान ने इजरायल के साथ-साथ खाड़ी क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों को भी निशाना बनाने का दावा किया है। विश्लेषकों के मुताबिक, अरामको पर हमला आर्थिक दबाव बनाने की रणनीति का हिस्सा हो सकता है, ताकि अमेरिका और उसके सहयोगियों को ऊर्जा बाजार के जरिये प्रभावित किया जा सके।
वैश्विक मंदी का खतरा
ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि मौजूदा हालात वैश्विक तेल बाजार के लिए बेहद संवेदनशील मोड़ हैं। तेल की कीमतों में तेज उछाल से महंगाई बढ़ सकती है, सप्लाई चेन प्रभावित हो सकती है और वैश्विक आर्थिक वृद्धि पर असर पड़ सकता है।
सऊदी अरब और यूएई जैसे देश अपनी ऊर्जा अवसंरचना की सुरक्षा को लेकर सतर्क हो गए हैं। यदि संघर्ष और बढ़ता है, तो इसका असर केवल मध्य-पूर्व तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि दुनिया भर में ईंधन की कीमतों और घरेलू बजट पर सीधा प्रभाव पड़ेगा।
फिलहाल अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजर इस बात पर है कि क्या कूटनीतिक प्रयास तनाव कम कर पाएंगे या ऊर्जा संकट और गहराएगा।


