ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली खामेनेई की मौत पर भारत की चुप्पी — विपक्ष ने बयान की मांग की, सरकार राष्ट्रीय हित का हवाला देती हुई़

नई दिल्ली: शनिवार को हुए अमेरिकी-इजरायल हमलों में ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली खामेनेई के मारे जाने की खबर के बाद कई देशों ने उन पर शोक व्यक्त किया, लेकिन भारत की ओर से अब तक कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं हुआ है। खामेनेई की मौत को लेकर भारत के रूख पर विपक्षी दलों ने सरकार से औपचारिक प्रतिक्रिया की मांग की है, वहीं केंद्र सरकार ने आगाह किया है कि मौजूदा चुप्पी “राष्ट्रीय हितों और कूटनीतिक प्राथमिकताओं” पर आधारित है।

भारत की प्रतिक्रिया: “सोची-समझी चुप्पी” या नीति का परिणाम?

सरकार ने स्पष्ट किया है कि भारत की विदेश नीति हमेशा से तथ्यों और दीर्घकालिक हितों पर आधारित रही है, न कि आवेगजनित प्रतिक्रियाओं पर। विदेश मंत्रालय के सूत्रों का कहना है कि खामेनेई के खिलाफ भारत-ईरान संबंधों में पहले भी कई तनाव पैदा हो चुके हैं, जिनके कारण भारत को कई बार अपना रुख स्पष्ट करना पड़ा।

भारत-ईरान संबंधों में पहले भी तनाव

सरकारी तथ्यों के अनुसार, 2017 से 2024 के बीच खामेनेई ने कम से कम चार मौकों पर भारत के आंतरिक मामलों में टिप्पणी या हस्तक्षेप किया, जिससे नई दिल्ली को ईरानी राजदूतों को तलब करना पड़ा था।
• कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटने के बाद 2019 में खामेनेई ने कश्मीर को लेकर तटस्थ नहीं रहते हुए भारत की नीतियों की आलोचना की थी।
• 2020 में दिल्ली दंगों के संदर्भ में उन्होंने ‘हिंदू चरमपंथियों द्वारा मुसलमानों का नरसंहार’ जैसे बयान दिए और सोशल मीडिया पर भड़काऊ हैशटैग का समर्थन किया।
• ईरानी संसद ने भारत के नागरिकता संशोधन कानून (CAA) की भी कड़ी आलोचना की थी।
• सितंबर 2024 में खामेनेई ने भारत की तुलना गाजा और म्यांमार से करते हुए टिप्पणी की, जिसका भारत ने कड़ा विरोध जताया था।

वैश्विक रुख: शोक नहीं, आलोचना और प्रतिक्रिया

भारत की मौन प्रतिक्रिया विकसित देशों के रुख के अनुरूप है। किसी भी G7 देश ने खामेनेई की मौत पर शोक या संवेदना नहीं जताई। अमेरिका ने उन्हें “इतिहास का सबसे दुष्ट व्यक्ति” बताया, जबकि कई यूरोपीय देशों ने उनके अंत पर संतोष व्यक्त किया। ऐसे में भारत, खुद को एक जिम्मेदार लोकतंत्र बताते हुए वैश्विक मानकों के अनुरूप ही प्रतिक्रिया कर रहा है।

खाड़ी रणनीति और भारत की प्राथमिकताएं

विश्लेषकों के अनुसार, भारत-ईरान संबंधों में मौजूदा चुप्पी रणनीतिक साझेदारों के प्रति संतुलन का भी संकेत है। भारत के लिए सऊदी अरब और यूएई जैसे खाड़ी देश आर्थिक, ऊर्जा और बृहद् रणनीतिक साझेदारी के लिहाज से अधिक अहम हैं, जिनमें करोड़ों भारतीय प्रवासी कार्य करते हैं।

पिछले दिनों ईरान-खाड़ी तनाव के बीच यूएई ने ईरान के कुछ कड़े कदमों पर नाराजगी जताई और तेहरान में अपने दूतावास को अस्थायी रूप से बंद कर दिया। ऐसे में भारत की किसी एक पक्षीय प्रतिक्रिया से खाड़ी सहयोगियों-साझेदारों के साथ तनाव की आशंका भी बल पा सकती थी।

विपक्ष की मांग और सरकार का रुख

विपक्षी दलों ने इस मुद्दे पर कांग्रेस, तमिलनाडु और अन्य पार्टियों के माध्यम से सरकार से स्पष्ट बयान देने की मांग की है। उन्होंने कहा है कि एक महत्वपूर्ण वैश्विक घटना पर भारत को अपनी विदेश नीति स्पष्ट रूप से व्यक्त करनी चाहिए।

लेकिन केंद्र सरकार का कहना है कि 57 मुस्लिम देशों के संगठन (OIC) में भी केवल 10 से कम देशों ने खामेनेई की मौत पर शोक जताया है। भारत ने लंबे समय से विवादों के समाधान के लिए संवाद और कूटनीति पर जोर दिया है, जैसा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में कनाडा के प्रधानमंत्री के साथ संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस में भी दोहराया था।

संयम और कूटनीति पर जोर

विदेश मंत्रालय की ओर से कहा गया है कि संयम और संवाद भारत की प्राथमिकताएं हैं, और वर्तमान स्थितियों में यह रणनीतिक हितों पर आधारित निर्णय है। भारत ने ईरान-खाड़ी तनाव पर संयम बरतने और कूटनीति को ही आगे बढ़ाने पर भी जोर दिया है।

(यह समाचार लेख राजनीतिक घटनाओं पर आधारित है और वर्तमान उपलब्ध जानकारी के आधार पर तैयार किया गया है।)

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