हाईकोर्ट के ‘चक्रव्यूह’ में फंसी बिहार STF: 1 लाख का इनामी देवा गुप्ता गिरफ्तार कर छोड़ा; वकीलों का बड़ा दावा— “यह सरेआम कोर्ट की अवमानना है”

पटना/मोतिहारी | 27 फरवरी, 2026: राजधानी पटना के राधिका अपार्टमेंट में शुक्रवार को हुई जिस ‘हाई-प्रोफाइल’ गिरफ्तारी ने पुलिस महकमे में वाहवाही बटोरी थी, वह कुछ ही घंटों में ‘कानूनी फजीहत’ में बदल गई। मोतिहारी के मोस्ट वांटेड और एक लाख के इनामी अपराधी देवा गुप्ता को एसटीएफ ने गिरफ्तार तो किया, लेकिन शाम ढलते-ढलते उन्हें रिहा करना पड़ा। इस नाटकीय घटनाक्रम ने पुलिस की कार्यप्रणाली और कानूनी जानकारी पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

एक्शन के बाद ‘यू-टर्न’: क्या हुआ शाम 6 बजे?

​दोपहर में पाटलिपुत्र थाना क्षेत्र के राधिका अपार्टमेंट (फ्लैट-303) से देवा गुप्ता की गिरफ्तारी की खबर जंगल की आग की तरह फैली थी। लेकिन शाम करीब 6 बजे उनके वकीलों ने दावा किया कि देवा गुप्ता को छोड़ दिया गया है।

  • वकीलों का तर्क: अधिवक्ता निलंजन चटर्जी और कुमारेश सिंह ने बताया कि देवा गुप्ता के पास पहले से ही गिरफ्तारी पर ‘स्टे ऑर्डर’ था।
  • हाईकोर्ट की अवमानना: वकीलों के अनुसार, 24 दिसंबर 2025 को आपराधिक रिट याचिका (संख्या 3330/2025) में पटना हाईकोर्ट ने देवा गुप्ता की गिरफ्तारी पर रोक लगा दी थी।

टाइमिंग पर उठे सवाल: “होली की छुट्टियों का फायदा उठाने की कोशिश”

​देवा गुप्ता के कानूनी पक्ष ने पुलिस पर बेहद गंभीर आरोप लगाए हैं:

  1. जानबूझकर गिरफ्तारी: वकीलों का कहना है कि राज्य सरकार को स्टे ऑर्डर की जानकारी थी, फिर भी कोर्ट का समय समाप्त होने के बाद और होली की छुट्टियों से ठीक पहले यह कार्रवाई की गई।
  2. कानूनी राहत में बाधा: आरोप लगाया गया कि छुट्टियों के दौरान गिरफ्तारी इसलिए की गई ताकि उन्हें तुरंत कानूनी मदद या बेल मिलने में देरी हो।

कौन है देवा गुप्ता? #1 ऑन हिट लिस्ट

​कानूनी पेंच के बावजूद, पुलिस रिकॉर्ड में देवा गुप्ता का प्रोफाइल किसी ‘क्राइम थ्रिलर’ जैसा है:

  • मोस्ट वांटेड: मोतिहारी के एसपी स्वर्ण प्रभात ने उन्हें जिले के टॉप-100 अपराधियों की सूची में नंबर-1 पर रखा था।
  • इनामी राशि: उनकी गिरफ्तारी पर 1 लाख रुपये का इनाम घोषित है।
  • आपराधिक इतिहास: उनके खिलाफ हत्या, रंगदारी और जमीन कब्जाने जैसे 28 गंभीर मामले दर्ज हैं।

VOB का नजरिया: पुलिस की ‘होमवर्क’ में कमी?

यह मामला बिहार पुलिस और एसटीएफ के लिए एक बड़ा सबक है। एक ओर जहाँ एसटीएफ ने खुफिया जानकारी के दम पर कुख्यात अपराधी को खोज निकाला, वहीं दूसरी ओर ‘स्टे ऑर्डर’ की जानकारी न होना या उसे नजरअंदाज करना भारी पड़ गया। अगर हाईकोर्ट ने वाकई गिरफ्तारी पर रोक लगा रखी थी, तो यह कार्रवाई न केवल विफल हुई बल्कि पुलिस को ‘अवमानना’ (Contempt of Court) के कठघरे में खड़ा कर सकती है। क्या यह महकमे के भीतर समन्वय (Coordination) की कमी है?

ब्यूरो रिपोर्ट, द वॉयस ऑफ बिहार (VOB)।

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