पटना में ‘संवैधानिक’ शहनाई: ना फेरे, ना पंडित, ना दहेज; दो अफसरों ने संविधान को साक्षी मान रचाई शादी, समाज को दिया बराबरी का संदेश

पटना | 27 फरवरी, 2026: बिहार की राजधानी पटना एक ऐसी ‘क्रांतिकारी’ शादी की गवाह बनी है, जिसकी गूंज पूरे देश में सुनाई दे रही है। जब समाज के दो सबसे ऊंचे ओहदों पर बैठे अधिकारी पारंपरिक पाखंड और फिजूलखर्ची को त्यागकर सादगी का रास्ता चुनते हैं, तो वह केवल एक विवाह नहीं, बल्कि एक सामाजिक आंदोलन बन जाता है। यहाँ एक SDO दूल्हे और BPRO दुल्हन ने सात फेरों के बजाय भारत के संविधान को साक्षी मानकर एक-दूसरे का साथ निभाने का संकल्प लिया।

जब ‘अधिकारी’ बने मिसाल: कौन हैं ये नवदंपति?

​इस शादी की सबसे खास बात दूल्हा-दुल्हन की शैक्षणिक और पेशेवर पृष्ठभूमि है:

  • दूल्हा: अनंत यादव (IITian और अनुमंडल कल्याण पदाधिकारी – SDM स्तर)।
  • दुल्हन: उन्हीं के बैच की प्रखंड पंचायती राज पदाधिकारी (BPRO)।

​दोनों ने अपनी इस विशेष शुरुआत के लिए किसी भव्य दिखावे को नहीं, बल्कि बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर के विचारों और भारत के संविधान को चुना।

शादी की 4 बड़ी बातें: जो इसे बनाती हैं ‘अनोखा’

  1. पाखंड मुक्त आयोजन: समारोह में ना कोई पंडित था, ना मंत्रोच्चार और ना ही अग्नि के सामने सात फेरे।
  2. दहेज को ‘ना’: शिक्षित और सरकारी पद पर होने के बावजूद दोनों ने दहेज जैसी कुप्रथा को सिरे से नकार दिया।
  3. संवैधानिक शपथ: दूल्हा-दुल्हन ने हाथ में संविधान लेकर बराबरी, गरिमा और साथ रहने की शपथ ली।
  4. सादगी और संदेश: फिजूलखर्ची को रोककर यह संदेश दिया गया कि शादियाँ दिखावे से नहीं, बल्कि विचारों के मिलन से सफल होती हैं।

बदल रहा है भारत: संविधान को साक्षी मानने का बढ़ता ‘ट्रेंड’

​यह कोई पहली घटना नहीं है, बल्कि देशभर के शिक्षित युवाओं में यह एक नई वैचारिक क्रांति के रूप में उभर रहा है:

स्थान

तारीख

कौन थे जोड़े?

विशेष पहल

पटना, बिहार

फरवरी 2026

SDO और BPRO

संविधान की शपथ, पाखंड मुक्त विवाह।

सिरमौर, हि.प्र.

26 अक्टूबर 2025

सुनील और विनोद (दो भाई)

कार्ड पर बुद्ध और अंबेडकर की तस्वीर, सादा विवाह।

हनुमानगढ़, राज.

नवंबर 2025

हेमंत और करीना (दो जज)

दो न्यायिक अधिकारियों का बिना दहेज विवाह।

VOB का नजरिया: क्या यह ‘भविष्य’ की शादी है?

​सोशल मीडिया पर इस शादी को लेकर बहस छिड़ी है। जहाँ कुछ लोग इसे परंपराओं का उल्लंघन मान रहे हैं, वहीं युवाओं का एक बड़ा वर्ग इसे “तर्कसंगत और आधुनिक भारत” की तस्वीर बता रहा है। खासकर सरकारी पदों पर बैठे लोगों द्वारा ऐसी पहल करना समाज के उन परिवारों के लिए एक कड़ा संदेश है जो शादियों में कर्ज लेकर दिखावा करते हैं या दहेज की मांग करते हैं।

“जब कानून के रखवाले (जज और अफसर) खुद संविधान को अपना मार्गदर्शक मानते हैं, तो वह समाज में ‘समानता’ की असली नींव रखते हैं।”

ब्यूरो रिपोर्ट, द वॉयस ऑफ बिहार (VOB)।

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