बिहार विधानसभा में उस वक्त हड़कंप मच गया जब उपमुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा ने जमीन के दस्तावेजों को लेकर गंभीर खुलासा किया। उन्होंने सदन को आगाह करते हुए कहा कि कई मामलों में जमीन के अभिलेखों को जानबूझकर छिपाने या साजिशन नष्ट करने की शिकायतें मिली हैं। यह महज लापरवाही नहीं, बल्कि सुनियोजित साजिश का हिस्सा हो सकता है।
केवल 45% जमीन खतियानी श्रेणी में दर्ज
सदन में पेश आंकड़ों के मुताबिक राज्य में सिर्फ 45 प्रतिशत जमीन ही पूरी तरह खतियानी श्रेणी में दर्ज है। सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि करीब 5 प्रतिशत जमीनों के दस्तावेज या तो गायब हैं या उन्हें योजनाबद्ध तरीके से मिटा दिया गया है। इस खुलासे के बाद सियासी हलचल तेज हो गई है।
डिजिटल रिकॉर्ड से कसेगा शिकंजा
उपमुख्यमंत्री ने स्पष्ट कहा कि सरकार अब हाई-टेक डिजिटल व्यवस्था लागू करने जा रही है, जिससे हर इंच जमीन का रिकॉर्ड सुरक्षित रखा जाएगा। राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग को निर्देश दिए गए हैं कि विवादरहित जमीनों का सर्वे जल्द पूरा किया जाए, ताकि भविष्य में होने वाले जमीनी विवादों को रोका जा सके।
बक्सर और गोपालगंज से आई शिकायतें
बक्सर और गोपालगंज से मिली शिकायतों ने मामले को और गंभीर बना दिया है। डुमरांव क्षेत्र में 1989 के सर्वे के दौरान असली रैयतों के वंशजों के नाम होते हुए भी जमीन को ‘अनाबाद बिहार सरकार’ खाते में दर्ज करने का मामला सामने आया।
डुमरांव के विधायक राहुल सिंह ने जब यह मुद्दा सदन में उठाया तो सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों हैरान रह गए।
दोषियों पर होगी कड़ी कार्रवाई
सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि किसी अधिकारी या कर्मचारी की लापरवाही या मिलीभगत सामने आती है, तो उसके खिलाफ सख्त दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी। फाइलों की जांच और जिम्मेदारों की जवाबदेही तय करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।
हालांकि विजय कुमार सिन्हा ने यह भी भरोसा दिलाया कि जमीन से जुड़े मामलों में न्यायालय का विकल्प हमेशा खुला रहेगा।
अब बड़ा सवाल यह है कि क्या डिजिटल व्यवस्था जमीन से जुड़े ‘खेल’ पर पूरी तरह विराम लगा पाएगी, या फिर यह मुद्दा आने वाले दिनों में और बड़ा राजनीतिक विवाद बनेगा?


