रोहतास पुलिस का अजब कारनामा: खेल-खेल के विवाद में 9 साल के बच्चे पर लगा दिया SC-ST एक्ट; जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड हैरान

रोहतास | 21 फरवरी, 2026: बिहार के रोहतास जिले से पुलिसिया कार्यप्रणाली और कानून के घोर दुरुपयोग का एक ऐसा हैरान करने वाला मामला सामने आया है, जिसने न्याय व्यवस्था पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं। जिले के नौहट्टा थाना की पुलिस ने बच्चों के आपसी विवाद में महज 9 साल के एक मासूम बच्चे पर अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (SC-ST) अत्याचार निवारण अधिनियम जैसी गंभीर धाराओं के तहत प्राथमिकी (FIR) दर्ज कर दी है।

​जब यह मामला किशोर न्याय परिषद (JJB) के समक्ष पहुंचा, तो वहां बैठे मजिस्ट्रेट भी पुलिस की इस भारी लापरवाही को देखकर दंग रह गए।

क्या है पूरा मामला?

​जानकारी के अनुसार, नौहट्टा थाना क्षेत्र में बच्चों के बीच खेलते समय मामूली कहासुनी और मारपीट हो गई थी।

  • प्राथमिकी दर्ज: इस घटना को लेकर 7 दिसंबर 2025 को एक पक्ष की महिला ने थाने में लिखित शिकायत दी थी।
  • गंभीर धाराएं: पुलिस ने मामले की बिना किसी प्राथमिक जांच के त्वरित कार्रवाई के नाम पर चार बच्चों सहित अन्य लोगों को नामजद कर लिया और उन पर SC-ST एक्ट समेत अन्य गंभीर धाराएं थोप दीं।

जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड (JJB) की फटकार और अल्टीमेटम

​गुरुवार, 19 फरवरी को जब इस मामले की सुनवाई किशोर न्याय परिषद (JJB) के समक्ष हुई, तो पुलिस की कलई खुल गई।

  1. उम्र देखकर मजिस्ट्रेट हैरान: बोर्ड के मजिस्ट्रेट अमित कुमार पांडेय और सदस्य तेज बली सिंह ने जब आरोपी बच्चे को देखा, तो उसकी उम्र बमुश्किल 9 से 10 वर्ष के बीच थी। इतनी कम उम्र के बच्चे पर SC-ST एक्ट लगाना प्रथम दृष्टया पुलिस की भारी लापरवाही को दर्शाता है।
  2. FIR में छोड़े गए खाली कॉलम: जब बोर्ड ने प्राथमिकी की समीक्षा की, तो पाया कि पुलिस ने FIR के कई महत्वपूर्ण कॉलम खाली छोड़ दिए थे। किसी भी आरोपी (बच्चे या वयस्क) की उम्र का स्पष्ट उल्लेख नहीं किया गया था।
  3. 24 घंटे का अल्टीमेटम: मामले की गंभीरता को देखते हुए बोर्ड ने तुरंत बच्चे को उसके अभिभावकों को सौंप दिया है। साथ ही, नौहट्टा थानाध्यक्ष को 24 घंटे के भीतर स्पष्टीकरण देने का कड़ा निर्देश जारी किया है। जवाब संतोषजनक न होने पर वरीय अधिकारियों को रिपोर्ट भेजी जाएगी।

थानाध्यक्ष की ‘अजीबोगरीब’ सफाई

​इस भारी चूक पर नौहट्टा थानाध्यक्ष दिवाकर कुमार का तर्क भी कम हैरान करने वाला नहीं है। उनका कहना है:

​”हमने प्राप्त आवेदन के आधार पर प्राथमिकी दर्ज की है। पीड़ित पक्ष द्वारा दिए गए आवेदन पर त्वरित FIR दर्ज करना पुलिस की प्राथमिकता और वरीय अधिकारियों का निर्देश है। अनुसंधान (Investigation) के दौरान जो भी तथ्य सामने आएंगे, उसी के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी।”

द वॉयस ऑफ बिहार का सवाल

​’त्वरित कार्रवाई’ का मतलब यह कतई नहीं है कि पुलिस बिना आंख खोले किसी 9 साल के बच्चे पर इतनी संगीन धाराएं लगा दे, जो उसका पूरा भविष्य बर्बाद कर सकती हैं। क्या पुलिस महकमे को ‘एफआईआर का कोटा’ पूरा करने के लिए अब मासूम बच्चे ही मिल रहे हैं? इस लापरवाही के लिए जिम्मेदार पुलिसकर्मियों पर भी सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।

ब्यूरो रिपोर्ट, द वॉयस ऑफ बिहार।

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