बिहार की सियासत में भूचाल: हाईकोर्ट ने 28 विधायकों को थमाया नोटिस; हलफनामे में जानकारी छिपाने और चुनावी गड़बड़ी का गंभीर आरोप

द वॉयस ऑफ बिहार | पटना (20 फरवरी 2026)

​बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के परिणामों के बाद अब ‘माननीयों’ की कुर्सी पर कानूनी तलवार लटकती नजर आ रही है। पटना हाईकोर्ट ने चुनाव के दौरान दिए गए हलफनामों में गलत जानकारी देने और चुनावी प्रक्रिया में अनियमितता के आरोपों पर प्रारंभिक सुनवाई करते हुए 28 नवनिर्वाचित विधायकों को नोटिस जारी किया है। अदालत ने इन याचिकाओं पर सख्त रुख अपनाते हुए जवाब तलब किया है।

क्यों शुरू हुई कानूनी कार्रवाई?

​वर्ष 2025 के विधानसभा चुनाव संपन्न होने के बाद विभिन्न निर्वाचन क्षेत्रों के पराजित उम्मीदवारों और निर्दलीयों ने कुल 40 चुनाव याचिकाएं (Election Petitions) दायर की थीं। न्यायमूर्ति शशि भूषण प्रसाद सिंह और न्यायमूर्ति अशोक कुमार पांडेय की खंडपीठ इन मामलों की सुनवाई कर रही है।

ये हैं माननीयों पर लगे 4 प्रमुख आरोप

​याचिकाकर्ताओं ने निर्वाचित विधायकों के खिलाफ साक्ष्यों के साथ निम्नलिखित गंभीर आरोप लगाए हैं:

  1. आपराधिक इतिहास छुपाना: कई विधायकों पर आरोप है कि उन्होंने अपने ऊपर दर्ज मुकदमों की जानकारी हलफनामे में नहीं दी।
  2. संपत्ति का गलत ब्योरा: चल-अचल संपत्ति और आय के स्रोतों की सही जानकारी सार्वजनिक नहीं करने का आरोप है।
  3. मतदान में गड़बड़ी: कुछ क्षेत्रों में वोटिंग के दौरान धांधली और गड़बड़ी के दावे किए गए हैं।
  4. मतगणना में अनियमितता: काउंटिंग के समय नियमों की अनदेखी और गड़बड़ी का आरोप लगाकर निर्वाचन रद्द करने की मांग की गई है।

इन दिग्गजों के खिलाफ भी याचिकाएं

​अदालत ने जिन विधायकों के खिलाफ याचिकाओं पर सुनवाई शुरू की है, उनमें सरकार के कई कद्दावर चेहरे और प्रमुख नेता शामिल हैं:

  • विधानसभा अध्यक्ष: प्रेम कुमार
  • मंत्री: बिजेन्द्र प्रसाद यादव, रत्नेश कुमार, और रामा निषाद
  • अन्य प्रमुख नाम: जीबेश कुमार, शुभानंद मुकेश, विनोद नारायण झा, बैद्यनाथ प्रसाद, राज कुमार राय और विजय कुमार उर्फ विजय सिंह।
  • विशेष: अजय कुमार और राजेश कुमार सिंह के खिलाफ दो-दो याचिकाएं दायर की गई हैं।

​इसके अलावा सूची में सुनील कुमार, जितेन्द्र कुमार, चेतन आनंद, संगीता कुमारी और कविता देवी समेत कई अन्य नाम भी शामिल हैं।

​हाईकोर्ट की इस सख्ती के बाद अब इन विधायकों को अपनी सदस्यता बचाने के लिए अदालत में पुख्ता जवाब देना होगा। अगर आरोप सिद्ध होते हैं, तो कई सीटों पर दोबारा चुनाव की नौबत भी आ सकती है।

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