बिहार की आर्द्रभूमियां: धरती की ‘किडनी’ बचा रही है पर्यावरण, राज्य में रामसर साइट्स की संख्या बढ़कर हुई 6

बड़ी उपलब्धि: 4526 आर्द्रभूमियां चिन्हित, 4316 का हुआ भू-सत्यापन; जलवायु परिवर्तन की मार कम करने में निभा रही हैं अहम भूमिका

वॉइस ऑफ बिहार (पटना)

​बिहार की आर्द्रभूमियां (Wetlands) न केवल जल संरक्षण का माध्यम हैं, बल्कि वे धरती की ‘किडनी’ के रूप में काम कर पर्यावरण को शुद्ध बना रही हैं। जलवायु परिवर्तन के इस दौर में बिहार के ये प्राकृतिक जल-क्षेत्र प्रदूषित पानी को छानने और पारिस्थितिकी तंत्र को संतुलित रखने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। 10 फरवरी को जारी ताज़ा आंकड़ों के अनुसार, राज्य में संरक्षण और संवर्धन के प्रयासों ने एक नई ऊंचाई छुई है।

बिहार में आर्द्रभूमियों का विशाल जाल

​राज्य सरकार द्वारा किए गए सर्वेक्षण के अनुसार, वर्तमान में बिहार में 2.25 हेक्टेयर से बड़ी कुल 4526 आर्द्रभूमियां चिन्हित की गई हैं। राहत की बात यह है कि इनमें से 4316 आर्द्रभूमियों का भू-सत्यापन (Ground Verification) कार्य सफलतापूर्वक पूरा कर लिया गया है। यह राज्य के जल-पारिस्थितिकी तंत्र को सुरक्षित करने की दिशा में एक बड़ा कदम है।

अब बिहार में 6 रामसर साइट्स: अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मिली पहचान

​बिहार के लिए गर्व का विषय है कि हाल ही में तीन और आर्द्रभूमियों को अंतरराष्ट्रीय महत्व की ‘रामसर साइट’ का दर्जा मिला है। अब राज्य में कुल 6 रामसर साइट्स हो गई हैं:

  1. कांवर झील (बेगूसराय)
  2. नागी पक्षी आश्रयणी (जमुई)
  3. नकटी पक्षी आश्रयणी (जमुई)
  4. गोगाबिल जलाशय (कटिहार)
  5. गोकुल जलाशय (बक्सर)
  6. उदयपुर झील (पश्चिम चंपारण)

​विश्व आर्द्रभूमि दिवस 2026 के अवसर पर केंद्र सरकार द्वारा राज्य आर्द्रभूमि प्राधिकरण के सदस्य सचिव एस. चंद्रशेखर को इन उपलब्धियों के लिए विशेष प्रमाण पत्र देकर सम्मानित भी किया गया है।

सिर्फ पर्यावरण ही नहीं, अर्थव्यवस्था की भी है धड़कन

​आर्द्रभूमियां बिहार की ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए ‘रीढ़ की हड्डी’ के समान हैं। ये लाखों लोगों की आजीविका का सीधा साधन हैं:

  • मछली पालन: बड़ी आबादी इन जलाशयों पर निर्भर है।
  • नकदी फसलें: मखाना, जूट और सिंघाड़ा जैसी फसलों की खेती इन्हीं क्षेत्रों के पारिस्थितिकी तंत्र पर आधारित है।
  • प्रवासी पक्षी: देश-विदेश से आने वाले पक्षियों के लिए ये सुरक्षित आश्रय स्थल हैं, जो पर्यटन को भी बढ़ावा देते हैं।

निष्कर्ष: संरक्षण ही भविष्य

​विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इन आर्द्रभूमियों का संरक्षण इसी गति से जारी रहा, तो बिहार न केवल बाढ़ और सूखे जैसी समस्याओं से निपटने में सक्षम होगा, बल्कि जैव विविधता के मामले में भी अग्रणी राज्य बनेगा।

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