जनसुराज की याचिका सुप्रीम कोर्ट से खारिज, CJI बोले—जनादेश न मिले तो अदालत का सहारा ठीक नहीं

नई दिल्ली: प्रशांत किशोर की जनसुराज पार्टी द्वारा बिहार विधानसभा चुनाव रद्द कराने की मांग पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए याचिका खारिज कर दी। पार्टी ने अदालत में दलील दी थी कि चुनाव से पहले सरकार द्वारा मुफ्त योजनाओं की घोषणा और उनके क्रियान्वयन से चुनाव परिणाम प्रभावित हुए, इसलिए नतीजों को अवैध घोषित कर दोबारा चुनाव कराया जाए।

“हार के बाद चुनाव रद्द कराने की मांग सही नहीं”

मामले की सुनवाई करते हुए चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कड़ी टिप्पणी की। उन्होंने कहा,
“अगर जनता ने आपको स्वीकार नहीं किया तो राहत के लिए सीधे अदालत आ जाना उचित नहीं है। न्यायालय के मंच का इस तरह इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।”

चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने यह भी कहा कि जनसुराज ने 243 में से 242 सीटों पर उम्मीदवार उतारे, लेकिन एक भी सीट नहीं जीत सकी। बेंच ने सवाल किया—“आपको कितने वोट मिले? यदि किसी योजना से आपत्ति थी तो चुनाव से पहले चुनौती देनी चाहिए थी, हार के बाद पूरे चुनाव को रद्द करने की मांग तर्कसंगत नहीं है।”

हाई कोर्ट जाने की दी सलाह

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह मामला मूल रूप से राज्य से जुड़ा हुआ है, इसलिए याचिकाकर्ता को पहले हाई कोर्ट का रुख करना चाहिए। अदालत के इस रुख के बाद जनसुराज ने याचिका वापस लेने की इच्छा जताई, जिसे पीठ ने स्वीकार कर लिया।

जनसुराज का क्या था आरोप?

पार्टी की ओर से वरिष्ठ वकील सीयू सिंह ने दलील दी कि चुनाव आचार संहिता लागू रहने के दौरान मतदाताओं के खातों में पैसे ट्रांसफर किए गए, जिससे मतदाताओं को प्रभावित करने की कोशिश हुई। खास तौर पर मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना को लेकर आपत्ति जताई गई।

याचिका में कहा गया कि चुनाव से ठीक पहले इस योजना के तहत हर परिवार की एक महिला को 10 हजार रुपये देने की घोषणा की गई, ताकि वह स्वरोजगार शुरू कर सके। साथ ही आकलन के बाद 2 लाख रुपये तक की अतिरिक्त सहायता का प्रावधान भी रखा गया। इस योजना को जीविका से जोड़ा गया, जिसमें पहले से लगभग एक करोड़ महिलाएं पंजीकृत थीं। बाद में अपंजीकृत महिलाओं को भी जोड़ने की अनुमति दी गई, जिससे लाभार्थियों की संख्या बढ़कर करीब 1.56 करोड़ हो गई।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मायने

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से साफ है कि चुनावी हार के बाद नतीजों को अदालत के जरिए पलटने की कोशिशों को न्यायपालिका प्रोत्साहित नहीं करेगी। अब जनसुराज के पास हाई कोर्ट जाने का विकल्प बचा है, जहां वह अपनी दलीलें दोबारा रख सकती है।


 

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