बिजली चोरी मामले में पटना हाईकोर्ट ने सजायाफ्ता को किया बरी

मंगलवार को पटना उच्च न्यायालय ने बिजली चोरी से जुड़े एक अहम मामले में सुनवाई करते हुए सजायाफ्ता को बरी कर दिया। अदालत ने पाया कि 1 करोड़ 31 लाख 33 हजार 664 रुपये के इस मामले में अभियोजन पक्ष आरोप साबित करने में पूरी तरह विफल रहा।

निचली अदालत का आदेश रद्द

जस्टिस शैलेन्द्र सिंह की एकलपीठ ने सजायाफ्ता मो. मकसूद आलम की ओर से दायर आपराधिक अपील पर सुनवाई करते हुए गया के विशेष न्यायाधीश (विद्युत), मगध क्षेत्र के आदेश को निरस्त कर दिया।

स्पेशल कोर्ट ने सुनाई थी सजा

विशेष न्यायालय ने मो. मकसूद आलम को धारा 135(1) के तहत दोषी ठहराते हुए विद्युत अधिनियम, 2007 के अंतर्गत तीन वर्ष के कठोर कारावास और 5,000 रुपये जुर्माना की सजा सुनाई थी। जुर्माना अदा नहीं करने की स्थिति में चार महीने के साधारण कारावास का आदेश भी दिया गया था।

अभियोजन पक्ष की गंभीर चूक

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष न तो आरोपों को प्रमाणित कर सका और न ही जांच की प्रक्रिया को सही तरीके से प्रस्तुत कर पाया। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि:

  • मामले में अनुसंधानकर्ता की गवाही तक दर्ज नहीं कराई गई
  • छापेमारी के समय अपीलकर्ता मौके पर मौजूद नहीं था
  • केवल अनिल पांडेय के बयान के आधार पर अपीलकर्ता को अभियुक्त बनाया गया
  • जांच के दौरान अनिल पांडेय को निर्दोष मानते हुए ट्रायल में शामिल नहीं किया गया

बिजली पहले से थी कटी

अदालत ने यह भी पाया कि संबंधित परिसर की बिजली बिल भुगतान नहीं होने के कारण पहले ही काट दी गई थी, ऐसे में बिजली चोरी का आरोप कमजोर पड़ता है।

कोर्ट का निष्कर्ष

इन सभी तथ्यों के आधार पर पटना हाईकोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष अपना केस स्थापित करने में पूरी तरह असफल रहा और इसी आधार पर सजायाफ्ता को बरी कर दिया गया।


 

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