सरकारी डॉक्टरों की प्राइवेट प्रैक्टिस पर रोक के ऐलान से मचा घमासान, डॉक्टरों का विरोध, विपक्ष ने उठाए सवाल

पिछले दिनों ‘समृद्धि यात्रा’ के दौरान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा सरकारी डॉक्टरों की प्राइवेट प्रैक्टिस पर पूरी तरह से रोक लगाने के ऐलान के बाद सियासी और प्रशासनिक हलकों में हलचल तेज हो गई है। डॉक्टरों के संगठन इस फैसले को अव्यवहारिक बता रहे हैं, जबकि विपक्ष सरकार की नीयत पर सवाल उठा रहा है। वहीं सत्ता पक्ष का दावा है कि यह निर्णय पूरी तरह से मरीजों के हित में है।

मुख्यमंत्री ने क्या कहा था

16 जनवरी को बेतिया में आयोजित सभा को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा था कि वर्ष 2025–30 के लिए ‘सात निश्चय-3’ के तहत स्वास्थ्य व्यवस्था को सुदृढ़ किया जाएगा। इसके अंतर्गत जिला और प्रखंड स्तर पर अस्पतालों को विशिष्ट चिकित्सा केंद्र बनाया जाएगा, निजी अस्पतालों की स्थापना को प्रोत्साहन दिया जाएगा और सरकारी चिकित्सकों की निजी प्रैक्टिस पर रोक लगाने की नीति लागू की जाएगी।

डॉक्टरों ने फैसले को बताया असंभव

सरकारी चिकित्सकों की निजी प्रैक्टिस पर रोक के प्रस्ताव पर डॉक्टरों ने कड़ा एतराज जताया है। पटना के वरिष्ठ चिकित्सक और आईएमए के पूर्व अध्यक्ष डॉ. अजय कुमार ने इसे अव्यवहारिक करार देते हुए कहा कि वर्तमान परिस्थितियों में ऐसा निर्णय लागू करना संभव नहीं है। उन्होंने बताया कि इस तरह का प्रयास पहले भी किया जा चुका है, लेकिन हर बार सरकार को पीछे हटना पड़ा है।

डॉ. अजय कुमार के अनुसार, वर्ष 2000 में सरकारी डॉक्टरों की प्राइवेट प्रैक्टिस पर रोक लगाने के लिए कानून बनाया गया था, जो आज भी अस्तित्व में है। सवाल यह है कि जब कानून मौजूद है, तो पिछले 25 वर्षों में इसे लागू क्यों नहीं किया गया। इससे सरकार की गंभीरता पर सवाल उठते हैं।

क्यों नहीं हो पाया अब तक लागू

डॉ. अजय कुमार का कहना है कि प्रैक्टिस बंद करने को लेकर सरकार के भीतर नॉन प्रैक्टिसिंग अलाउंस (NPA) को लेकर हमेशा भ्रम रहा है। आईजीआईएमएस जैसे संस्थानों में प्रैक्टिस बंद की गई, लेकिन वहां डॉक्टरों को एनपीए दिया जाता है। यही कारण है कि पूरे राज्य में इस कानून को प्रभावी ढंग से लागू नहीं किया जा सका।

बार-बार क्यों उठता है मुद्दा

डॉ. अजय कुमार का आरोप है कि सरकार समय-समय पर लोकप्रियता के लिए इस मुद्दे को उठाती है। उनका कहना है कि बिहार में स्वास्थ्य व्यवस्था में सुधार सिर्फ भवन निर्माण तक सीमित रह गया है। अस्पतालों में इमारतें तो बन रही हैं, लेकिन विशेषज्ञ डॉक्टरों और संसाधनों की भारी कमी है, जिसके कारण मरीज सरकारी अस्पतालों की बजाय निजी अस्पतालों का रुख करते हैं।

विपक्ष का सरकार पर हमला

इस मुद्दे पर राष्ट्रीय जनता दल ने भी सरकार पर निशाना साधा है। आरजेडी प्रवक्ता एजाज अहमद ने कहा कि इससे पहले भी प्राइवेट प्रैक्टिस पर रोक लगाने की कोशिश की गई थी, लेकिन वह टिक नहीं सकी। उन्होंने कहा कि केवल निजी प्रैक्टिस पर रोक लगाने से स्वास्थ्य व्यवस्था में सुधार नहीं होगा, इसके लिए गंभीर और ठोस प्रयास जरूरी हैं।

सत्ता पक्ष ने फैसले का किया बचाव

वहीं जेडीयू प्रवक्ता अंजुम आरा ने सरकार के फैसले का समर्थन करते हुए कहा कि यह निर्णय किसी डॉक्टर के खिलाफ नहीं, बल्कि मरीजों के हित में है। उनका कहना है कि इस पहल से ग्रामीण और दूर-दराज के इलाकों में रहने वाले मरीजों को समय पर और बेहतर इलाज मिल सकेगा। उन्होंने विपक्ष पर बेवजह राजनीति करने का आरोप लगाया।

जमीनी हकीकत

बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था की स्थिति किसी से छिपी नहीं है। खासकर ग्रामीण इलाकों में डॉक्टरों की अनुपस्थिति, दवाओं की कमी और अव्यवस्थित स्वास्थ्य केंद्रों की शिकायतें आम हैं। दरभंगा के वासुदेवपुर अतिरिक्त स्वास्थ्य केंद्र को लेकर स्थानीय लोगों का कहना है कि यहां न तो नियमित रूप से डॉक्टर उपलब्ध रहते हैं और न ही समुचित इलाज की सुविधा है।

निष्कर्ष

सरकारी डॉक्टरों की प्राइवेट प्रैक्टिस पर रोक का मुद्दा एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। जहां सरकार इसे जनहित का फैसला बता रही है, वहीं डॉक्टर इसे अव्यवहारिक और विपक्ष इसे राजनीतिक कदम करार दे रहा है। अब देखना यह होगा कि सरकार इस ऐलान को नीति और जमीन पर कितनी मजबूती से उतार पाती है।

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