पटना। उपमुख्यमंत्री सह राजस्व एवं भूमि सुधार मंत्री विजय कुमार सिन्हा ने कहा है कि भूमि सुधार जनकल्याण संवाद के दौरान नागरिकों से संवाद में यह स्पष्ट रूप से सामने आया है कि आम लोग राजस्व न्यायालयों में न्याय की उम्मीद लेकर आते हैं। ऐसे में यदि समान प्रकृति के मामलों में अलग-अलग स्तरों पर भिन्न निर्णय दिए जाते हैं, तो यह न्याय की मूल भावना के विरुद्ध है।
बुधवार को जारी बयान में उपमुख्यमंत्री ने कहा कि सरकार का उद्देश्य राजस्व न्यायालय प्रबंधन प्रणाली (Revenue Court Management System) के माध्यम से पारदर्शी, समान और कानूनसम्मत न्याय सुनिश्चित करना है। इसी दिशा में महाधिवक्ता के विधिक परामर्श को मार्गदर्शक मानते हुए निर्णय प्रक्रिया में एकरूपता लाने के निर्देश दिए गए हैं, ताकि प्रत्येक नागरिक को भरोसेमंद और निष्पक्ष न्याय मिल सके।
विभिन्न जिलों में समीक्षा के दौरान सामने आई असमानता
विदित हो कि उपमुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा की अध्यक्षता में अब तक पटना, लखीसराय, मुजफ्फरपुर, पूर्णिया, सहरसा और भागलपुर में आयोजित भूमि सुधार जनकल्याण संवाद के दौरान राजस्व न्यायालय प्रबंधन प्रणाली के तहत पारित आदेशों की विस्तृत समीक्षा की गई।
समीक्षा में यह तथ्य सामने आया कि प्रमंडलीय आयुक्त, समाहर्ता, अपर समाहर्ता, भूमि सुधार उप समाहर्ता और अंचल अधिकारी स्तर के न्यायालयों द्वारा समान प्रकृति के मामलों में कई बार अलग-अलग निर्णय दिए जा रहे हैं। इससे आम नागरिकों को एक जैसे मामलों में भिन्न परिणाम मिल रहे हैं, जो न्यायिक समानता के सिद्धांत के विपरीत है।
निर्णय प्रक्रिया में एकरूपता के निर्देश
इस स्थिति को गंभीर मानते हुए उपमुख्यमंत्री ने स्पष्ट निर्देश दिया कि राजस्व न्यायालयों की निर्णय प्रक्रिया को एकरूप, पारदर्शी और विधि-सम्मत बनाया जाए, ताकि “एक ही प्रकार के मामले में एक जैसा न्याय” सुनिश्चित हो सके।
इसी उद्देश्य से राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग के प्रधान सचिव सी.के. अनिल द्वारा 13 जनवरी 2026 को सभी समाहर्ताओं को विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं। निर्देशों में कहा गया है कि प्रशासनिक एवं अर्ध-न्यायिक निर्णय लेते समय महाधिवक्ता के विधिक परामर्श को मार्गदर्शक सिद्धांत के रूप में अपनाया जाए।
विधिक परामर्श बाध्यकारी नहीं, लेकिन मार्गदर्शक
निर्देशों में यह स्पष्ट किया गया है कि महाधिवक्ता का परामर्श बाध्यकारी नहीं है, लेकिन वह विधि-सम्मत, मान्य और न्यायिक कसौटी पर खरा उतरने वाला होता है। इसका उद्देश्य विभिन्न स्तरों के राजस्व न्यायालयों द्वारा पारित आदेशों में अनावश्यक भिन्नता को रोकना है।
प्रक्रिया के अनुरूप ही संशोधन या समाप्ति
दिशा-निर्देशों में यह भी रेखांकित किया गया है कि किसी निर्णय को जिस प्रक्रिया से लिया गया हो, उसी प्रक्रिया के माध्यम से उसमें संशोधन या समाप्ति की जानी चाहिए। विधि विभाग द्वारा गठित अधिवक्ताओं के पैनल को किसी अन्य प्राधिकरण द्वारा एकतरफा भंग करना विधि-सम्मत नहीं माना जाएगा। ऐसे निर्णय अधिकार क्षेत्र से बाहर और मनमाने समझे जाएंगे।
प्राकृतिक न्याय और संविधान के अनुरूप आदेश जरूरी
प्रधान सचिव द्वारा जारी पत्र में स्पष्ट किया गया है कि सभी अर्ध-न्यायिक आदेश प्राकृतिक न्याय, संविधान के अनुच्छेद 14 और अनुपातिकता के सिद्धांतों के अनुरूप होने चाहिए। किसी भी व्यक्ति या संस्था के विरुद्ध निर्णय लेने से पहले उन्हें पूर्ण सुनवाई का अवसर देना अनिवार्य है।
बिना ठोस आधार, अस्पष्ट या तथ्यहीन आदेशों को अवैध माना जाएगा, क्योंकि ऐसे आदेश न्यायिक व्यवस्था में असमानता को बढ़ावा देते हैं।


