पटना। बिहार सरकार के मंत्री अशोक चौधरी हाल के दिनों में सहायक प्राध्यापक (असिस्टेंट प्रोफेसर) की नियुक्ति को लेकर विवादों में घिरे रहे। विपक्ष ने उन पर गलत तरीके से नौकरी हासिल करने का आरोप लगाया, लेकिन अब इस पूरे मामले में बिहार राज्य विश्वविद्यालय सेवा आयोग (BSUSC) की विस्तृत रिपोर्ट सामने आ गई है, जिसने सभी आरोपों को खारिज कर दिया है।
नियुक्ति प्रक्रिया क्या थी
करीब पांच साल पहले बिहार के विभिन्न विश्वविद्यालयों में राजनीति विज्ञान विषय के 280 सहायक प्राध्यापक पदों के लिए आयोग ने नियुक्ति प्रक्रिया शुरू की थी।
4 जुलाई 2025 को इसका परिणाम जारी हुआ, जिसमें 276 अभ्यर्थियों का चयन किया गया।
SC कोटे से चयनित हुए अशोक चौधरी
परिणाम सूची में अनुसूचित जाति कोटि के अंतर्गत क्रमांक 10 पर मंत्री अशोक चौधरी का नाम शामिल था। उन्हें पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के सहायक प्राध्यापक पद के लिए चयनित किया गया।
सरकार के भीतर ही अटक गई फाइल
आयोग ने 1 अगस्त 2025 को चयनित अभ्यर्थियों की नियुक्ति की अनुशंसा शिक्षा विभाग को भेज दी, लेकिन यहीं से मामला उलझ गया।
शिक्षा विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने फाइल रोक दी। बताया जाता है कि इस दौरान विभागीय स्तर पर आंतरिक खींचतान और व्यक्तिगत समीकरणों ने भूमिका निभाई।
परिणाम यह हुआ कि अन्य विषयों के सहायक प्राध्यापकों की नियुक्ति हो गई, लेकिन राजनीति विज्ञान की नियुक्ति रोक दी गई।
विपक्ष को मिला राजनीतिक मुद्दा
मामले की जानकारी बाहर आते ही कांग्रेस और राजद ने सरकार और मंत्री अशोक चौधरी पर हमला तेज कर दिया। मुख्य आरोप यह लगाया गया कि अशोक चौधरी के प्रमाण-पत्रों में नाम अलग-अलग है।
नाम को लेकर क्या था विवाद
शिक्षा विभाग का कहना था कि कुछ दस्तावेजों में नाम अशोक कुमार और कुछ में अशोक चौधरी दर्ज है, जिससे नियुक्ति संदिग्ध हो जाती है।
पांच महीने बाद आयोग से मांगा गया जवाब
करीब पांच महीने की सियासी बयानबाजी के बाद 1 जनवरी 2026 को उच्च शिक्षा निदेशक एन.के. अग्रवाल ने विश्वविद्यालय सेवा आयोग से औपचारिक स्पष्टीकरण मांगा।
आयोग ने बिंदुवार दी सफाई
आयोग ने अपने जवाब में स्पष्ट किया कि:
- ऑनलाइन आवेदन में नाम अशोक कुमार दर्ज है
- मैट्रिक, इंटर, स्नातक और पीएचडी सहित सभी शैक्षणिक प्रमाण-पत्रों में नाम अशोक कुमार है
- कई आधिकारिक दस्तावेजों में नाम Ashok Choudhary alias Ashok Kumar दर्ज है
- पिता का नाम और पता सभी दस्तावेजों में समान है
- जाति और निवास प्रमाण-पत्र सक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी किए गए हैं
- प्रस्तुत सभी नाम एक ही व्यक्ति से संबंधित हैं
आयोग ने साफ कहा कि कोई फर्जीवाड़ा नहीं हुआ है और चयन पूरी तरह नियमों के अनुसार किया गया है।
कोर्ट के फैसले भी अशोक चौधरी के पक्ष में
इस तरह के मामलों में सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न हाईकोर्ट पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि:
- व्यक्ति को अपने नाम के उपयोग और परिवर्तन का अधिकार है
- नाम पहचान का मूल हिस्सा है
- तकनीकी कारणों से किसी की पहचान या अधिकार नहीं छीने जा सकते
नियुक्ति का रास्ता साफ
विश्वविद्यालय सेवा आयोग की रिपोर्ट और न्यायालयों के फैसलों के बाद अशोक चौधरी की सहायक प्राध्यापक पद पर नियुक्ति का रास्ता साफ हो गया है।
हालांकि, बड़ा सवाल यह बना हुआ है कि क्या सरकार के भीतर चल रही खींचतान अब थमेगी या इस मामले में आगे भी सियासत जारी रहेगी। इसका जवाब आने वाले दिनों में मिलेगा।


