मनरेगा के नाम बदलने के प्रस्ताव पर सियासी बवाल, भागलपुर में कांग्रेस का एक दिवसीय उपवास

भागलपुर। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) के नाम बदलने के केंद्र सरकार के प्रस्ताव को लेकर देशभर में सियासी हलचल तेज हो गई है। इसी कड़ी में भागलपुर में जिला कांग्रेस कमेटी ने शुक्रवार को केंद्र सरकार के फैसले के खिलाफ एक दिवसीय उपवास रखकर विरोध जताया। यह उपवास कार्यक्रम भागलपुर स्टेशन चौक स्थित डॉ. भीमराव अंबेडकर गोलंबर के पास आयोजित किया गया, जहां बड़ी संख्या में कांग्रेस कार्यकर्ता जुटे।

दरअसल, केंद्र सरकार की ओर से प्रस्ताव रखा गया है कि मनरेगा का नाम बदलकर “विकसित भारत–जी राम जी (VB-G RAM G) योजना” किया जाए। साथ ही योजना के तहत रोजगार के दिनों को 100 से बढ़ाकर 125 दिन करने और साप्ताहिक भुगतान व्यवस्था लागू करने की बात कही गई है। सरकार का तर्क है कि इससे ग्रामीण विकास और आजीविका सुरक्षा को मजबूती मिलेगी। हालांकि यह प्रस्ताव अभी संसद में विचाराधीन है और अंतिम निर्णय होना बाकी है।

“गांधी के नाम से चलने वाली योजना का नाम बदलना अपमान”

उपवास कार्यक्रम के दौरान के जिला अध्यक्ष ने केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि महात्मा गांधी देश के राष्ट्रपिता हैं और उनके नाम से चलने वाली योजना का नाम बदलना गांधीजी के विचारों और ग्रामीण गरीबों के अधिकारों का अपमान है।

प्रवेज जमाल ने आरोप लगाया कि भाजपा सरकार मनरेगा के मूल उद्देश्य को कमजोर करना चाहती है। उन्होंने आशंका जताई कि नई व्यवस्था के तहत मजदूरों की जगह मशीनों से काम कराए जाने का रास्ता खुल सकता है, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लाखों मजदूरों की रोज़ी-रोटी पर सीधा असर पड़ेगा।

पंचायत स्तर तक आंदोलन का ऐलान

कांग्रेस नेताओं ने साफ किया कि पार्टी इस फैसले का हर स्तर पर विरोध करेगी। जिला अध्यक्ष ने कहा कि कांग्रेस कार्यकर्ता प्रखंड, पंचायत और वार्ड स्तर तक जाकर मजदूरों को इस प्रस्ताव के प्रभाव के बारे में जागरूक करेंगे। उनका कहना था कि मनरेगा केवल एक योजना नहीं, बल्कि ग्रामीण गरीबों के लिए जीवनरेखा है।

एक दिवसीय उपवास कार्यक्रम में जिला कांग्रेस कमेटी के कई पदाधिकारी और कार्यकर्ता मौजूद रहे। नेताओं ने केंद्र सरकार से मांग की कि मनरेगा के नाम और स्वरूप से छेड़छाड़ न की जाए और मजदूरों के हितों की रक्षा की जाए।

मनरेगा को लेकर शुरू हुआ यह विवाद अब संसद से निकलकर सड़कों तक पहुंच चुका है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर सियासी टकराव और तेज़ हो सकता है।

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