पटना। बिहार की राजधानी पटना एक बार फिर अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत से जुड़ने जा रही है। करीब 10 वर्षों तक बंद रहने के बाद भारतीय नृत्य कला मंदिर का ऐतिहासिक ओपन-एयर स्टेज 23 जनवरी को दोबारा खुलने जा रहा है। यह पुनः उद्घाटन सिर्फ पटना ही नहीं, बल्कि पूरे बिहार के सांस्कृतिक इकोसिस्टम के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।
23 जनवरी को प्रस्तावित है पुनः उद्घाटन
कला, संस्कृति एवं युवा विभाग की उप सचिव और भारतीय नृत्य कला मंदिर की प्रभारी कहकशां ने बताया कि कोरोना काल के दौरान ओपन-एयर स्टेज के जीर्णोद्धार का कार्य शुरू हुआ था। इसके बाद पास में मेट्रो स्टेशन निर्माण के कारण कार्य प्रभावित हुआ, जिससे लंबे समय तक यह स्थल बंद रहा।
उन्होंने बताया कि ओपन-एयर स्टेज का सिविल वर्क लगभग पूरा हो चुका है और विभाग की योजना है कि 23 जनवरी (सरस्वती पूजा) के शुभ अवसर पर इसका पुनः उद्घाटन किया जाए। हालांकि, उद्घाटन को लेकर अंतिम स्वीकृति अभी शेष है।
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इनॉगरेशन में लोक संस्कृति की झलक
कहकशां के अनुसार, कला संस्कृति मंत्री को इस संबंध में अवगत करा दिया गया है और सभी संबंधित विभागों को पत्र भेजे जा चुके हैं। उद्घाटन अवसर पर लगभग दो घंटे का सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करने की योजना है।
इस कार्यक्रम में—
- भारतीय नृत्य कला मंदिर की ओर से दो लोक नृत्य प्रस्तुतियां
- असम के कलाकारों द्वारा माघ बिहू की प्रस्तुति
- सोलो डांस और सोलो सिंगिंग
शामिल किए जाने की योजना है।
5000 दर्शकों की क्षमता, हुआ सौंदर्यीकरण
ओपन-एयर स्टेज में लगभग 5000 दर्शकों के बैठने की क्षमता होगी। पहले भी यहां इतनी ही सीटें थीं, लेकिन अब इसके सौंदर्यीकरण और सुविधाओं को बेहतर किया गया है। एक समय यह मंच पटना की सांस्कृतिक गतिविधियों का सबसे बड़ा केंद्र हुआ करता था।
“इसके दोबारा खुलने से नियमित सांस्कृतिक कार्यक्रम, कवि सम्मेलन, मुशायरे, नृत्य-नाटिकाएं और संगीत समारोह फिर से यहां लौटेंगे। कला प्रेमियों को इससे बड़ा लाभ मिलेगा।”
— कहकशां, उप सचिव, कला संस्कृति विभाग
कलाकारों की पहचान गढ़ने वाला मंच
बिहार के लोकप्रिय कवि चंदन द्विवेदी के अनुसार, भारतीय नृत्य कला मंदिर राज्य की कला, साहित्य और संस्कृति का जीवंत प्रतीक रहा है। यहां कविता, ग़ज़ल, नृत्य और संगीत की कई ऐतिहासिक प्रस्तुतियां हुई हैं।
अहमद फ़राज़, गोपालदास नीरज और राहत इंदौरी जैसे दिग्गज कवियों की आवाज़ ने इस मंच को ऐतिहासिक पहचान दिलाई। यह सिर्फ प्रस्तुति का मंच नहीं, बल्कि कलाकारों की पहचान गढ़ने वाला स्थल रहा है।
सांस्कृतिक इकोसिस्टम को मिलेगा नया जीवन
करीब एक दशक बाद इस मंच के पुनः सक्रिय होने से बिहार की सांस्कृतिक दुनिया को नई ऊर्जा मिलने की उम्मीद है। यह मंच स्थानीय कलाकारों के साथ-साथ राष्ट्रीय स्तर के आयोजनों की मेजबानी कर पटना को फिर से कला और साहित्य का केंद्र बना सकता है।
“यह स्थल उपेंद्र महारथी जैसी महान शख्सियत की कलात्मक विरासत को फिर से जीवित करेगा। उनकी रचनात्मक सोच ने इसे सिर्फ इमारत नहीं, बल्कि सांस्कृतिक धरोहर बनाया।”
— चंदन द्विवेदी, कवि
1950 में हुई स्थापना, 1963 में बना ओपन-एयर स्टेज
भारतीय नृत्य कला मंदिर की स्थापना 1950 में प्रसिद्ध कला साधक धूमल रघु उपाध्याय ने की थी। 1963 में ओपन-एयर स्टेज का निर्माण हुआ, जिसने इसे उत्तर भारत के चुनिंदा सांस्कृतिक स्थलों में शामिल कर दिया।
इस मंच के डिज़ाइन में महान शिल्पकार उपेंद्र महारथी की रचनात्मक सोच स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। चारों ओर घने पेड़, खुला आसमान और प्राकृतिक वातावरण इसे विशिष्ट बनाते हैं। अनुकूल मौसम में यह स्थल किसी सांस्कृतिक स्वप्न नगरी जैसा प्रतीत होता है।


