नीतीश कुमार के ‘उत्तराधिकारी’ और बिहार की सियासत – जिन पर हाथ रखा, वे सत्ता से क्यों हुए दूर?

पटना। बिहार की राजनीति में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पिछले लगभग 20 वर्षों से सत्ता के केंद्र में बने हुए हैं। इस दौरान उन्होंने कई नेताओं को आगे बढ़ाया, उनकी सार्वजनिक रूप से प्रशंसा की और कई बार यह संकेत भी दिया कि वे भविष्य में नेतृत्व की जिम्मेदारी संभाल सकते हैं। लेकिन विडंबना यह रही कि जिन नेताओं को नीतीश कुमार ने अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी माना या बनाया, वे समय के साथ सत्ता से बाहर होते चले गए या राजनीतिक रूप से हाशिये पर पहुंच गए।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह सिर्फ संयोग नहीं बल्कि नीतीश कुमार की सुनियोजित राजनीतिक रणनीति का हिस्सा रहा है, ताकि पार्टी और गठबंधन दोनों स्तरों पर कोई भी नेता उनके कद के बराबर न उभर सके।


वे पांच नेता, जिन पर रहा ‘नीतीश का हाथ’

1. सुशील मोदी

नीतीश कुमार के शुरुआती और सबसे भरोसेमंद सहयोगियों में सुशील मोदी का नाम सबसे ऊपर आता है।
2010 विधानसभा चुनाव के दौरान नीतीश कुमार ने प्रचार के लिए नरेंद्र मोदी को बिहार आने से रोका था और कहा था कि उनके पास पहले से ही “एक मोदी” मौजूद है। उस समय सुशील मोदी बिहार बीजेपी का बड़ा चेहरा थे और सरकार में उपमुख्यमंत्री थे।

2014 के बाद सुशील मोदी का राजनीतिक प्रभाव धीरे-धीरे घटता गया। बाद में दोबारा एनडीए में सरकार बनी, लेकिन उनका कद पहले जैसा नहीं रहा। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नीतीश कुमार से उनकी नजदीकी ही उनके सीमित राजनीतिक विस्तार की वजह बनी।


2. उपेंद्र कुशवाहा

एक समय उपेंद्र कुशवाहा को नीतीश कुमार का संभावित उत्तराधिकारी माना जाता था। कई मौकों पर नीतीश कुमार ने उन्हें आगे बढ़ने का संकेत दिया।
2014 में वे केंद्र में मंत्री बने, लेकिन इसके बाद लगातार चुनावी असफलताओं का सामना करना पड़ा। लंबे समय तक वे राजनीतिक रूप से संघर्ष करते रहे। बाद में भाजपा से गठबंधन कर उन्हें फिर से राजनीतिक जीवन मिला।


3. प्रशांत किशोर

2015 में महागठबंधन की जीत के रणनीतिकार रहे प्रशांत किशोर बाद में जदयू में शामिल हुए और पार्टी में नंबर-दो की हैसियत तक पहुंचे। नीतीश कुमार ने सार्वजनिक मंचों से उन्हें अपना वारिस तक बताया।

कुछ समय बाद दोनों के बीच मतभेद बढ़े और प्रशांत किशोर पार्टी से बाहर हो गए। उन्होंने अपनी अलग पार्टी बनाई और लंबे समय तक पदयात्रा भी की, लेकिन चुनावी राजनीति में सफलता नहीं मिल सकी। आज उन्हें बिहार की राजनीति में हाशिये पर माना जाता है।


4. आरसीपी सिंह

आरसीपी सिंह जदयू में नीतीश कुमार के बाद सबसे प्रभावशाली नेता माने जाते थे। वे पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने और केंद्र में मंत्री भी रहे। उन्हें भी नीतीश कुमार का संभावित उत्तराधिकारी समझा गया।

लेकिन समय के साथ पार्टी से उनकी दूरी बढ़ती गई। उन्होंने जदयू छोड़ा, भाजपा और फिर अन्य राजनीतिक मंचों से जुड़े, लेकिन उनका राजनीतिक प्रभाव लगातार कम होता गया।


5. तेजस्वी यादव

2022 में नीतीश कुमार के महागठबंधन में शामिल होने के बाद तेजस्वी यादव को उपमुख्यमंत्री बनाया गया। नीतीश कुमार ने कई मंचों से तेजस्वी की तारीफ की और उन्हें आगे बढ़ने वाला नेता बताया।

इसके बाद नीतीश कुमार के एनडीए में लौटने के साथ ही तेजस्वी यादव सत्ता से बाहर हो गए। विधानसभा चुनाव में वे मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार बने, लेकिन राजद का प्रदर्शन उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा और पार्टी सत्ता से दूर रह गई।


अब चर्चा में सम्राट चौधरी

इन दिनों सियासी गलियारों में सम्राट चौधरी को लेकर चर्चाएं तेज हैं। हाल ही में नीतीश कुमार उनके पिता शकुनी चौधरी के जन्मदिन समारोह में पहुंचे और सम्राट चौधरी की खुलकर प्रशंसा की। नीतीश कुमार के बयान—“अच्छा काम कर रहा है, आगे जाएगा”—के बाद राजनीतिक हलकों में इसे नए संकेत के रूप में देखा जा रहा है।


विशेषज्ञों की राय

प्रिय रंजन भारती (राजनीतिक विश्लेषक)
नीतीश कुमार बिहार की राजनीति के चाणक्य हैं। सत्ता अपने पास बनाए रखना उन्हें आता है, लेकिन सम्राट चौधरी का मामला पहले के नेताओं से अलग भी हो सकता है।

सुनील पांडे (वरिष्ठ पत्रकार)
नीतीश कुमार बेहद चतुर राजनेता हैं। उन्होंने कई नेताओं को आगे बढ़ाया, लेकिन उनका राजनीतिक भविष्य हमेशा सुरक्षित नहीं रहा।

मृत्युंजय तिवारी (राजद प्रवक्ता)
नीतीश कुमार जिस गठबंधन में रहते हैं, उसी के अनुसार बोलते और व्यवहार करते हैं। तेजस्वी यादव के साथ भी यही हुआ।


निष्कर्ष

नीतीश कुमार की राजनीति में प्रशंसा भी रणनीति है और सत्ता संतुलन भी। इतिहास गवाह है कि जिन नेताओं को उन्होंने आगे बढ़ाया, वे अंततः सत्ता से दूर हो गए। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सम्राट चौधरी इस राजनीतिक परंपरा को तोड़ पाएंगे, या बिहार की राजनीति एक बार फिर खुद को दोहराएगी।


 

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