अशोक चौधरी की बढ़ी मुश्किलें: असिस्टेंट प्रोफेसर पद पर चयन के बाद भी नियुक्ति पर रोक, सर्टिफिकेट में गड़बड़ी का मामला

बिहार सरकार के ग्रामीण कार्य विभाग मंत्री और जदयू के कद्दावर नेता अशोक चौधरी इन दिनों एक नए विवाद में घिरते नजर आ रहे हैं। मामला पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर की नियुक्ति से जुड़ा है। अशोक चौधरी ने राजनीति शास्त्र के असिस्टेंट प्रोफेसर पद के लिए आवेदन किया था, जिसमें उनका चयन भी हो गया, लेकिन अब तक उन्हें नियुक्ति पत्र नहीं दिया गया है

18 में से 17 को नियुक्ति, अशोक चौधरी का नाम रोका गया

विश्वविद्यालय की ओर से कुल 18 चयनित उम्मीदवारों को नियुक्ति पत्र जारी किए गए, लेकिन अशोक चौधरी को इससे अलग रखा गया। विश्वविद्यालय सूत्रों के मुताबिक, उनके शैक्षणिक सर्टिफिकेट में गड़बड़ी पाई गई है, जिसके कारण नियुक्ति रोक दी गई है।

शिक्षा मंत्री ने की पुष्टि

इस पूरे मामले पर अब बिहार के शिक्षा मंत्री सुनील कुमार का बयान सामने आया है। सोमवार को आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने स्पष्ट कहा—

“कमीशन को यह मामला भेजा गया है। हमने समीक्षा की है, उसमें कुछ कमी पाई गई है। सर्टिफिकेट में डिफरेंस है, जिसकी गहराई से जांच की जा रही है.”
सुनील कुमार, शिक्षा मंत्री, बिहार

नाम में डिफरेंस बना वजह

सूत्रों के अनुसार, अशोक चौधरी के चुनावी हलफनामे, डी. लिट् के सर्टिफिकेट और अन्य शैक्षणिक प्रमाण पत्रों में नाम को लेकर अंतर पाया गया है
इसी कारण सर्टिफिकेट वेरिफिकेशन के बाद उनकी नियुक्ति पर रोक लगा दी गई, जबकि बाकी 17 उम्मीदवारों को कॉलेज आवंटित कर दिया गया है।

2020 की वैकेंसी, 2025 में शुरू हुई नियुक्ति

बताया जा रहा है कि 57 वर्षीय अशोक चौधरी ने जून 2024 में इंटरव्यू दिया था
यह भर्ती प्रक्रिया 2020 की वैकेंसी से संबंधित है, जिसमें 274 उम्मीदवारों ने आवेदन किया था। चयन के समय भी इस बहाली को लेकर विवाद हुआ था, लेकिन 2025 में नियुक्ति प्रक्रिया शुरू होते ही अशोक चौधरी का मामला अटक गया

जाति सर्वेक्षण पर डी. लिट् की डिग्री

गौरतलब है कि नवंबर 2024 में अशोक चौधरी को मगध विश्वविद्यालय के 22वें दीक्षांत समारोह में डी. लिट् (डॉक्टर ऑफ लिटरेचर) की उपाधि दी गई थी।
यह सम्मान राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान द्वारा प्रदान किया गया था।

जाति सर्वेक्षण बना शोध का विषय

अशोक चौधरी ने अपने शोध का विषय
“बिहार में जाति सर्वेक्षण की प्रासंगिकता: एक सामाजिक-राजनीतिक अध्ययन”
चुना था। डी. लिट् की डिग्री मिलने के बाद ही उन्होंने पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर पद के लिए आवेदन किया था

पहले से कर चुके हैं पीएचडी

हालांकि यह भी उल्लेखनीय है कि अशोक चौधरी पहले से पीएचडी डिग्री धारक हैं, बावजूद इसके सर्टिफिकेट में कथित अंतर उनके लिए परेशानी का सबब बन गया है।


 

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