पटना | 26 अक्टूबर 2025: लोक आस्था के महापर्व छठ पूजा पर इस बार संगीत में भी नारी शक्ति की नई गूंज सुनाई दे रही है। प्रसिद्ध लोकगायिका मनीषा श्रीवास्तव का नया छठ गीत “अब बेटियां भी उठाएंगी दउरा” सोशल मीडिया पर चर्चा में है। यह गीत समाज में बेटियों की उपलब्धियों और समानता की सोच को सलाम करता है।
मनीषा बताती हैं कि यह उनकी बेटियों पर आधारित तीसरी सीरीज है। उन्होंने कहा, “पिछले साल छठ पर ‘असो जोड़े कोड़े कोसी’ गीत गाया था, जो बेटी के जन्म की खुशी पर केंद्रित था। इस बार का गीत एक सवाल उठाता है – जब बेटियां आसमान छू सकती हैं, तो दउरा क्यों नहीं उठा सकतीं?”
लोकधुन में आधुनिक संदेश
मनीषा के इस गीत की खासियत यह है कि इसमें पारंपरिक भोजपुरी लोकधुन को बरकरार रखते हुए समाज में नारी सशक्तिकरण का आधुनिक संदेश बुना गया है। गीत में छठी मैया के प्रति आभार प्रकट करते हुए कहा गया है कि उनकी कृपा से बेटियां घर-घर में सौभाग्य बनकर आई हैं।
“अब बेटियां घर से लेकर संसद तक, खेत से लेकर विज्ञान प्रयोगशाला तक हर जगह अपनी भूमिका निभा रही हैं। ऐसे में पूरे गर्व के साथ वे छठी मैया के घाट पर दउरा लेकर आ रही हैं,” मनीषा कहती हैं।
छठ गीतों में बसती है भक्ति की आत्मा
मनीषा के अनुसार, छठ महापर्व में किसी मंत्रोच्चारण की जरूरत नहीं होती — यहां हर विधि, हर संस्कार गीतों से जुड़ा होता है। “नहाए-खाए, खरना, संध्या अर्घ्य और उषा अर्घ्य — हर चरण का अपना गीत है। यही गीत हमारे लिए मंत्र हैं और लोक आस्था का आधार हैं।”
भक्ति से भटकते गीतों पर चिंता
मनीषा ने आजकल के कुछ भोजपुरी गीतों के गिरते स्तर पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि, “छठ जैसे पवित्र पर्व में कुछ लोग अशोभनीय या राजनीतिक गीत गा रहे हैं, जो लोकधर्म के खिलाफ है। छठ के गीतों में केवल भक्ति, समर्पण और आस्था झलकनी चाहिए।”
शारदा सिन्हा से प्रेरणा
मनीषा मानती हैं कि शारदा सिन्हा ने छठ गीतों को अमर बना दिया। “शारदा जी भले अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनके गीत हर साल वैसे ही ताजे लगते हैं। उन्होंने लोकगायन में जो शुद्धता दी, वही हमारी प्रेरणा है,” उन्होंने कहा।
समाज में नई सोच की पहल
मनीषा का कहना है कि समाज में बदलाव की शुरुआत कला से होती है। “जब बेटियां छठी मैया के गीतों में आएंगी, जब उनके माथे पर दउरा सजेगा, तभी सच्चे अर्थों में समानता का संदेश फैलेगा।”
उनका मानना है कि छठ पूजा सिर्फ आस्था नहीं, बल्कि परिवार, समाज और प्रकृति के सामंजस्य का उत्सव है। बेटियों की भागीदारी इस पर्व को और भी अर्थपूर्ण बनाती है।


