
गोपालगंज का यह मंदिर पौराणिक मान्यताओं और ऐतिहासिक महत्व के कारण न केवल बिहार बल्कि नेपाल और उत्तर प्रदेश के श्रद्धालुओं का भी आस्था केंद्र है।
गोपालगंज: बिहार का प्रसिद्ध थावे भवानी मंदिर आस्था का ऐसा केंद्र है जिसकी ख्याति दूर-दूर तक फैली हुई है। पौराणिक मान्यताओं और ऐतिहासिक महत्व से जुड़ा यह मंदिर 16वीं शताब्दी में चेरो वंश द्वारा बनवाया गया था। बाद में हथुआ राजाओं ने इसका विकास कराया। आज भी यह मंदिर न केवल गोपालगंज बल्कि उत्तर प्रदेश और नेपाल समेत कई जिलों के श्रद्धालुओं का प्रमुख धार्मिक स्थल है।
मंदिर की खासियत
थावे भवानी मंदिर की विशेषता यह है कि माता भवानी की प्रतिमा के पास ही भक्त रहषु की प्रतिमा भी स्थापित है। मान्यता है कि रहषु भक्त की पुकार पर ही मां कामाख्या से निकलकर थावे पहुंची थीं। यही कारण है कि भक्त मां भवानी के दर्शन के बाद रहषु भक्त का भी दर्शन करते हैं।
भक्त रहषु और राजा मनन सेन से जुड़ा इतिहास
मंदिर के पुजारी संजय पांडेय बताते हैं कि इसका इतिहास भक्त रहषु और चेरो वंश के राजा मनन सेन से जुड़ा हुआ है।
एक समय अकाल पड़ा था। उस दौरान रहषु जंगल में रहते थे और मां भवानी की कृपा से जंगल से चावल निकालकर मां को भोग लगाते और परिवार का भरण-पोषण करते थे। जब यह बात राजा तक पहुंची तो उन्होंने रहषु से मां को बुलाने की जिद की। रहषु ने चेतावनी दी कि मां यहां आईं तो राज्य का विनाश हो जाएगा, लेकिन राजा नहीं माने।
अंततः रहषु ने मां भवानी को पुकारा। कहा जाता है कि मां कामाख्या से चलकर कोलकाता (दक्षिणेश्वर), पटना (पटन देवी), आमी (छपरा) होती हुई थावे पहुंचीं। मां के आगमन के समय तूफान, बारिश और अंधकार छा गया। दरबार में रहषु भक्त और राजा मनन सेन दोनों की मृत्यु हुई और उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हुई।
1714 में मंदिर की स्थापना
1714 में हथुआ के राजा युवराज शाही बहादुर ने दुर्गा मंदिर की स्थापना की। कहा जाता है कि मां दुर्गा ने उन्हें सपने में दर्शन दिए थे और इसके बाद उन्होंने दुश्मन पर विजय पाई। विजय के बाद राजा ने खुदाई कराई और वन दुर्गा की प्रतिमा मिलने पर मंदिर की स्थापना की।
पूजा-अर्चना और परंपराएं
थावे भवानी मंदिर में वैष्णव विधि से पूजा होती है। यहां नारियल, चुंदरी, पेड़ा और अन्य प्रसाद चढ़ाए जाते हैं। खास बात यह है कि यहां नारियल की बलि नहीं दी जाती, बल्कि भक्त नारियल चढ़ाकर वापस घर ले जाते हैं।
- शारदीय नवरात्र की अष्टमी तिथि पर मां की विशेष निशा पूजा होती है।
- इस दिन महागौरी की पूजा और मध्य रात्रि शृंगार किया जाता है।
- मान्यता है कि यहां चढ़ाए गए अक्षत से निःसंतान दंपति को संतान की प्राप्ति होती है और घर में समृद्धि आती है।
- हथुआ राजघराने की महारानी निशा पूजा के बाद हवन शुरू करती हैं और सदियों पुरानी परंपरा के अनुसार खोंइछा भरती हैं।
श्रद्धालुओं की आस्था
भक्तों का कहना है कि यहां मां भवानी से मांगी गई हर मन्नत पूरी होती है। नौकरी, विवाह या मुकदमा—जिस किसी भी समस्या से ग्रसित भक्त सच्चे मन से मां के चरणों में प्रार्थना करते हैं, उनकी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।
कैसे पहुंचें थावे?
- रेल मार्ग: थावे का अपना रेलवे स्टेशन है – थावे जंक्शन।
- सड़क मार्ग: गोपालगंज से अच्छी कनेक्टिविटी है। पटना, मुजफ्फरपुर और अन्य प्रमुख शहरों से बस व टैक्सी आसानी से उपलब्ध हैं।
निष्कर्ष
थावे भवानी मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल ही नहीं, बल्कि यह ऐसा स्थान है जहां भक्तों को शांति और आध्यात्मिक सुख का अनुभव होता है। मां भवानी की कृपा और मंदिर का इतिहास इसे बिहार के प्रमुख शक्तिपीठों में से एक बनाता है।


