भागलपुर के बाबई दादा कमाई का 70% बेजुबानों पर करते हैं खर्च, अब तक 300 से अधिक बेजुबानों की कर चुके सेवा

भागलपुर, 03 सितंबर।जहां लोग आवारा कुत्तों से दूरी बनाए रखते हैं, वहीं भागलपुर के मशाकचक के सतीश चंद्र लेन निवासी सौरभ बनर्जी उर्फ बाबई दादा पिछले चार दशकों से इन बेजुबान जानवरों की जिंदगी के सहारा बने हुए हैं। 1982 से अब तक वह अपनी कमाई का 70% हिस्सा कुत्तों के भोजन और दवाइयों में खर्च करते आ रहे हैं।

300 से अधिक कुत्तों की सेवा

सौरभ बनर्जी, जिन्होंने टीएनबी कॉलेज से बीकॉम की पढ़ाई की है और पेशे से प्राइवेट ट्यूटर रहे हैं, अब तक 300 से ज्यादा कुत्तों का पालन-पोषण कर चुके हैं। वर्तमान में उनके घर में करीब 25 कुत्ते रहते हैं। उनके घर को लोग “फीडिंग जोन” के नाम से जानते हैं, जहां आवारा कुत्ते बिना रोक-टोक आ-जा सकते हैं।

परिवार और रिश्तेदारों का साथ

कोरोना काल के बाद ट्यूशन का काम बंद होने पर आर्थिक मुश्किलें बढ़ीं, लेकिन उनकी बहन चंदना बनर्जी (आरबीआई से रिटायर्ड जनरल मैनेजर) समेत कई रिश्तेदार हर महीने आर्थिक मदद भेजते हैं। उनकी पत्नी भी इस सेवा कार्य में बराबरी का हाथ बंटाती हैं—सुबह उठकर कुत्तों के लिए दूध गर्म करना, चावल-दाल पकाना और बीमार कुत्तों की देखभाल करना उनकी दिनचर्या का हिस्सा है।

भोजन और इलाज की विशेष व्यवस्था

सौरभ बनर्जी रोजाना कुत्तों के लिए डेढ़ से दो किलो दूध और उतना ही चावल-दाल पकाते हैं। हफ्ते में एक-दो दिन अंडा भी देते हैं। घायल या बीमार कुत्तों के लिए अलग से व्यवस्था होती है। प्रो. रत्ना मुखर्जी (तिलकामांझी यूनिवर्सिटी) भी हर महीने 35-40 किलो चावल देकर उनकी मदद करती हैं।

पड़ोसियों का कहना

पड़ोस की केका भादुड़ी बताती हैं कि पिछले 40 साल से सौरभ बनर्जी को कुत्तों की सेवा करते देख रही हैं। उन्होंने कहा—“इनका फीलिंग अलग तरह का है, इस वजह से आज तक हमें कोई परेशानी या डर नहीं हुआ।”

सुप्रीम कोर्ट का आदेश और सौरभ की राय

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने आवारा कुत्तों के लिए बांझीकरण, टीकाकरण और फीडिंग प्वाइंट बनाए जाने का आदेश दिया है। सौरभ बनर्जी का कहना है कि इंसानों की तरह कुत्तों को भी जीने का हक है। उनका मानना है कि सुप्रीम कोर्ट का आदेश संतुलित है—“रेबीज संक्रमित और आक्रामक कुत्तों को अलग रखा जाना जरूरी है।”

कुत्ते ही संतान

सौरभ और उनकी पत्नी की कोई संतान नहीं है। वे कुत्तों को ही अपनी संतान मानते हैं। जब कोई कुत्ता मर जाता है, तो हिंदू रीति-रिवाज के अनुसार उसका अंतिम संस्कार करते हैं और तीन दिन तक शोक मानते हैं।

पारिवारिक पृष्ठभूमि

सौरभ बनर्जी मूल रूप से पश्चिम बंगाल के हुगली जिले के रहने वाले हैं। उनके दादा नारायण दास 1935 में भागलपुर आकर टीएनबी कॉलेज में गणित के प्रोफेसर बने। उनके पिता सच्चीदुलाल बनर्जी जेल डॉक्टर थे।


 

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