
विधायक चेतन आनंद और अस्पताल प्रशासन आमने-सामने
पटना, 2 अगस्त 2025: पटना स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में हुए विवाद ने अब राजनीतिक और प्रशासनिक तूल पकड़ लिया है। राजद के बागी विधायक चेतन आनंद और एम्स कर्मियों के बीच कथित मारपीट व बदसलूकी के मामले में दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर गंभीर आरोप लगाए हैं, जिसके बाद पुलिस ने दोनों की शिकायतों के आधार पर एफआईआर दर्ज कर ली है।
पुलिस: “हर एंगल से जांच जारी है”
नगर पुलिस अधीक्षक (पश्चिम), भानु प्रताप सिंह ने बताया कि
“विधायक चेतन आनंद और एम्स कर्मियों की ओर से शिकायतें प्राप्त हुई हैं। दोनों पक्षों द्वारा मारपीट, धमकी, और आपराधिक साजिश जैसे आरोप लगाए गए हैं। सभी पहलुओं की गहराई से जांच की जा रही है। दोषियों के विरुद्ध कानून के अनुसार निष्पक्ष कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी।”
आरोप-प्रत्यारोप: कौन क्या कह रहा है?
विधायक चेतन आनंद की ओर से आरोप लगाया गया है कि एम्स के सुरक्षा गार्ड और डॉक्टरों ने उनके साथ अभद्रता और मारपीट की।
वहीं एम्स प्रशासन की ओर से भी देर रात शिकायत दी गई, जिसमें कहा गया कि चेतन आनंद और उनके सहयोगियों ने पिस्टल दिखाकर धमकाया, मोबाइल छीना और अस्पताल परिसर में हंगामा किया।
मामला कैसे शुरू हुआ?
मिली जानकारी के अनुसार, चेतन आनंद किसी निजी व्यक्ति से मिलने के लिए पटना एम्स पहुंचे थे। वहीं किसी कारणवश एम्स प्रशासन और उनके बीच कहासुनी हुई जो बढ़कर झड़प में बदल गई। इसके बाद मामला मारपीट तक पहुंच गया।
डॉक्टरों ने किया हड़ताल, फिर बहाल की गई सेवा
इस विवाद के विरोध में शुक्रवार को एम्स के डॉक्टरों ने हड़ताल कर दी, जिससे कुछ समय के लिए स्वास्थ्य सेवाएं प्रभावित हुईं।
हालांकि, पुलिस और अस्पताल प्रशासन के हस्तक्षेप के बाद डॉक्टर्स से बातचीत कर उन्हें मना लिया गया, जिसके बाद सेवाएं बहाल कर दी गईं।
एसपी भानु प्रताप सिंह ने बताया —
“अस्पताल में इमरजेंसी सेवाएं सामान्य रूप से संचालित हैं। डॉक्टर्स से संवाद कर स्थिति नियंत्रण में ली गई है।“
निष्कर्ष: अब सबकी निगाहें पुलिस जांच पर
अब यह देखना अहम होगा कि पुलिस जांच क्या निष्कर्ष निकालती है। चूंकि दोनों ही पक्षों ने संगीन आरोप लगाए हैं, इसलिए सीसीटीवी फुटेज, चश्मदीद गवाहों और घटनाक्रम की क्रमानुसार जांच के बाद ही स्पष्ट हो पाएगा कि आखिर सच क्या है।
यह मामला जहां अस्पताल की गरिमा और सुरक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण है, वहीं यह सवाल भी खड़ा करता है कि क्या संवैधानिक पदों पर बैठे प्रतिनिधियों को संस्थागत प्रक्रियाओं का सम्मान नहीं करना चाहिए?


