भागलपुर | 30 जुलाई 2025: आशा कार्यकर्ताओं के मासिक मानदेय में हालिया वृद्धि को लेकर ऑल इंडिया सेंट्रल काउंसिल ऑफ ट्रेड यूनियन्स (ACTU) ने इसे उनके निरंतर संघर्ष और दबाव का परिणाम बताया है। ACTU के राज्य सचिव और भाकपा-माले के नगर प्रभारी मुकेश मुक्त ने इसे आंशिक जीत बताया और कहा कि जब तक सभी अधिकार नहीं मिल जाते, संघर्ष जारी रहेगा।
2023 के समझौते को सरकार ने किया नजरअंदाज
मुकेश मुक्त ने कहा कि 2023 में 35 दिनों की ऐतिहासिक हड़ताल के बाद 12 अगस्त को सरकार द्वारा मानदेय वृद्धि को लेकर लिखित समझौता हुआ था, लेकिन नीतीश–भाजपा सरकार ने राजनीतिक अड़चनों के बहाने उसे लागू नहीं किया। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने उस समझौते को जानबूझकर नजरअंदाज कर दिया।
उन्होंने कहा:
“अब जब चुनाव नजदीक है और सत्ता पर संकट मंडरा रहा है, तब सरकार आशा कार्यकर्ताओं को बहलाने की कोशिश कर रही है। लेकिन वे इस बार धोखे में नहीं आएंगे।”
राष्ट्रीय स्तर पर केंद्र सरकार पर भी निशाना
ACTU नेता ने केंद्र सरकार पर भी निशाना साधा और कहा कि 2018 के बाद से आशा कार्यकर्ताओं के लिए केंद्र की ओर से कोई मानदेय वृद्धि नहीं की गई है। उन्होंने आरोप लगाया कि राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) की हालिया सिफारिशों पर भी केंद्र सरकार चुप्पी साधे हुए है।
मुख्य मांगें:
- आशा और आशा फैसिलिटेटर को मानदेय कर्मी का दर्जा दिया जाए।
- NHM के तहत 12 अगस्त 2023 को हुए समझौते के अनुसार बकाया भुगतान किया जाए।
- NHM की 4 जुलाई 2025 की सिफारिश के तहत ₹3500 मासिक मानदेय को तत्काल लागू किया जाए।
संघर्षों की पृष्ठभूमि:
- 5 दिवसीय राज्यव्यापी हड़ताल
- 9 जुलाई 2025 की राष्ट्रीय हड़ताल
- विभिन्न स्थानों पर स्वास्थ्य मंत्री का घेराव
मुकेश मुक्त ने कहा कि इन आंदोलनात्मक प्रयासों से ही यह आंशिक जीत मिली है। उन्होंने कहा:
“यह लड़ाई तब तक जारी रहेगी जब तक आशा कार्यकर्ताओं को सम्मानजनक दर्जा और पूर्ण अधिकार नहीं मिल जाते।”
इस बयान के जरिए ACTU ने स्पष्ट संकेत दिया है कि मानदेय में हुई हालिया वृद्धि से आंदोलन थमेगा नहीं, बल्कि यह आगामी चुनावों में राजनीतिक दबाव बढ़ाने का एक हिस्सा है। इससे साफ है कि आशा कार्यकर्ताओं के अधिकारों की लड़ाई आने वाले महीनों में और तेज हो सकती है।


