2024-25 में लगाए गए करीब 7 करोड़ टीके, अब गांव-गांव पहुंच रही पशु चिकित्सा सेवाएं
पटना, 24 जुलाई।बिहार सरकार पशु स्वास्थ्य को प्राथमिकता देते हुए सात घातक रोगों से बचाव के लिए नि:शुल्क टीकाकरण अभियान चला रही है। इस पहल से न केवल पशुओं की असमय मृत्यु में गिरावट आई है, बल्कि पशुपालकों की आजीविका में भी सुधार हुआ है। पिछले वित्तीय वर्ष 2024-25 में राज्य में कुल 6.97 करोड़ टीके लगाए गए हैं।
2006-07 से बदली तस्वीर, टीकाकरण अभियान से आई समृद्धि
राज्य में 2006-07 से राज्यव्यापी पशु टीकाकरण अभियान की शुरुआत की गई थी। उस समय सिर्फ 1 करोड़ पशुओं को टीका लगाया गया था। वहीं 2024-25 में यह संख्या 6.97 करोड़ तक पहुंच चुकी है, जो दर्शाता है कि बिहार ने पशु स्वास्थ्य सेवा में कितनी बड़ी छलांग लगाई है।
सात बीमारियों से बचा रहे ये टीके:
राज्य सरकार जिन रोगों के खिलाफ टीकाकरण कर रही है, वे हैं:
- एचएस एवं बीक्यू (Hemorrhagic Septicemia & Black Quarter)
- एफएमडी (Foot and Mouth Disease)
- एलएसडी (Lumpy Skin Disease)
- पीपीआर (Peste des Petits Ruminants)
- ब्रुसेल्ला (Brucellosis)
- क्लासिक स्वाइन फीवर (CSF)
- अन्य जरूरी टीके
टीकाकरण के आंकड़े (2024-25):
| टीका | लगाए गए टीकों की संख्या |
|---|---|
| एचएस एवं बीक्यू | 1.91 करोड़ |
| एफएमडी | 2.01 करोड़ |
| एलएसडी | 1.16 करोड़ |
| पीपीआर | 1.09 करोड़ |
| ब्रुसेल्ला | 79.07 लाख |
- एलएसडी टीकाकरण वर्ष 2022-23 से शुरू हुआ था।
- पीपीआर और ब्रुसेल्ला टीकाकरण वर्ष 2016-17 से शुरू हुए थे।
पशुपालकों के लिए खुशहाली का रास्ता
सरकार की इस योजना ने पशुपालकों को आर्थिक रूप से मजबूत किया है। पहले जहां पशु रोगों के कारण किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ता था, अब टीकाकरण के कारण पशुओं की मृत्यु दर में कमी आई है। इससे दूध उत्पादन में वृद्धि, पशु संख्या में स्थायित्व और मासिक आय में इजाफा हुआ है।
गांव-गांव पहुंच रही पशु चिकित्सा सेवाएं
सरकार अब गांव-गांव पशु चिकित्सा सुविधा पहुंचा रही है ताकि टीकाकरण और इलाज की सुविधा हर पशुपालक के द्वार तक पहुंचे। इसके लिए मोबाइल वैन, स्थानीय स्वास्थ्य केंद्रों और डिजिटल निगरानी तंत्र का इस्तेमाल किया जा रहा है।
बिहार सरकार की यह पहल पशु स्वास्थ्य सुरक्षा, कृषि आधारित अर्थव्यवस्था और ग्रामीण विकास की दृष्टि से एक मील का पत्थर है। नि:शुल्क टीकाकरण अभियान के माध्यम से न केवल पशुओं की जान बचाई जा रही है, बल्कि पशुपालकों को समृद्ध और आत्मनिर्भर बनाया जा रहा है।


