मिथिला की परंपरा में रंगा सावन: मधुश्रावणी व्रत आज से शुरू

भागलपुर, 15 जुलाई – मिथिला की सांस्कृतिक पहचान और नवविवाहित महिलाओं की आस्था का प्रतीक मधुश्रावणी व्रत आज से शुरू हो गया। सावन माह में आरंभ होने वाला यह व्रत विवाहोपरांत पहले सावन में किया जाता है, जिसे मिथिला अंचल की स्त्रियाँ विशेष श्रद्धा और उत्साह के साथ निभाती हैं। कुल 13 दिनों तक चलने वाले इस व्रत का उद्देश्य पति की दीर्घायु, पारिवारिक सुख-शांति और दांपत्य जीवन की समृद्धि होता है।

क्या है मधुश्रावणी व्रत की परंपरा

यह परंपरा मिथिला क्षेत्र – विशेषकर दरभंगा, मधुबनी, समस्तीपुर, सहरसा, सुपौल और भागलपुर के कुछ हिस्सों में अत्यंत लोकप्रिय है। विवाह के बाद पहली बार मायके आई बहू इस व्रत को करती है। ससुराल पक्ष की ओर से विशेष पकवान, सुहाग सामग्री, श्रृंगार की वस्तुएं भेजी जाती हैं। बहू उन पकवानों को भगवान शिव और माता पार्वती को अर्पित करती है और प्रतिदिन कथा श्रवण तथा पूजन करती है।

लोककथाओं और लोकगीतों से गूंजता वातावरण

व्रत के हर दिन महिला मंडल द्वारा मिथिला की पारंपरिक लोककथाएं सुनाई जाती हैं, जिनमें मुख्य रूप से शिव-पार्वती विवाह, सावित्री-सत्यवान और गंगा उत्पत्ति की कहानियां होती हैं। महिलाएं पारंपरिक मैथिली गीतों के माध्यम से अपने मन की आस्था, सौभाग्य और समर्पण को प्रकट करती हैं। हर दिन में एक नई कथा होती है, और व्रत के अंतिम दिन विशेष समापन पूजा का आयोजन होता है।

बुद्धूचक की सोनम ने निभाई परंपरा

भागलपुर के बुद्धूचक की नवविवाहिता सोनम ने भी इस व्रत की शुरुआत की। उन्होंने बताया कि यह केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि दांपत्य संबंधों को मजबूत करने वाला संस्कार है। उनके अनुसार, “मैंने यह व्रत अपने पति अभिनव की लंबी उम्र और सुखी जीवन के लिए शुरू किया है। हर दिन पूजा, कथा और श्रृंगार से यह व्रत एक त्योहार जैसा लगता है।”

महिलाओं के लिए सामाजिक जुड़ाव का अवसर

मधुश्रावणी व्रत केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि महिलाओं के आपसी जुड़ाव, पारिवारिक समर्पण और परंपराओं की पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरण का भी अवसर बनता है। इस अवसर पर मायके में उत्सव का सा माहौल रहता है। बेटियों के स्वागत में माता-पिता पूरे मन से तैयारी करते हैं।

सांस्कृतिक संरक्षण की ज़रूरत

मधुश्रावणी जैसी परंपराएं न केवल धार्मिक, बल्कि सांस्कृतिक पहचान का भी हिस्सा हैं। आधुनिक जीवनशैली के प्रभाव में इन परंपराओं को संरक्षण और प्रोत्साहन की ज़रूरत है, ताकि भावी पीढ़ियां भी अपने सांस्कृतिक मूल से जुड़ी रहें।


 

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