कटाव पीड़ितों को मुआवजा दिलाने की लड़ाई में आमरण अनशन पर बैठे आशीष मंडल की तबीयत बिगड़ी

दिनांक: 13 जुलाई 2025 | मासाडू, भागलपुर

गंगा कटाव से त्रस्त मासाडू गांव के पीड़ितों को न्याय दिलाने के संकल्प के साथ पिछले पांच दिनों से आमरण अनशन पर बैठे आशीष मंडल की तबीयत रविवार को अचानक बिगड़ गई, जिसके बाद उन्हें जवाहरलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज अस्पताल, मायागंज में भर्ती कराया गया। प्रशासनिक हलकों में इस खबर के बाद हड़कंप मच गया।


‘जितिया अनशन’ से जताया समर्पण

गोपालपुर के विधायक गोपाल मंडल के पुत्र आशीष मंडल ने अपने आंदोलन को “जितिया अनशन” नाम दिया था, जो उन्होंने पूरी निष्ठा और आत्मबल के साथ जारी रखा था। उनका यह प्रतीकात्मक नामकरण गंगा किनारे रहने वाले परिवारों की पीड़ा और माताओं की पीढ़ियों से चली आ रही सुरक्षा की भावना को दर्शाता है।

अनशन के पांचवें दिन उनकी तबीयत बिगड़ने पर प्रशासन की टीम तत्काल हरकत में आई और उन्हें एंबुलेंस के माध्यम से मायागंज अस्पताल में भर्ती कराया गया। डॉक्टरों की एक विशेष टीम उनकी स्वास्थ्य निगरानी में लगी हुई है।


कटाव पीड़ितों के लिए उठी आवाज

गंगा के कटाव से बार-बार विस्थापित हो रहे मासाडू, साहेबगंज, हरिदासपुर जैसे गांवों के सैकड़ों परिवार लंबे समय से मुआवजा और पुनर्वास की मांग कर रहे हैं। लोगों का कहना है कि प्रशासनिक आश्वासन तो मिलते हैं, लेकिन जमीनी कार्रवाई अब तक नहीं हुई है।

आशीष मंडल का यह अनशन कटाव पीड़ितों के न्याय और हक के लिए समर्पित है। स्थानीय ग्रामीणों ने स्पष्ट कहा है कि जब तक उन्हें उचित मुआवजा और पुनर्वास की ठोस योजना नहीं मिलेगी, तब तक आंदोलन जारी रहेगा।


प्रशासन की प्रतिक्रिया

आशीष की तबीयत बिगड़ते ही प्रशासनिक अधिकारी मौके पर पहुंचे और तुरंत चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराई। जिलाधिकारी कार्यालय की ओर से संकेत मिले हैं कि प्रशासन इस मामले पर संवेदनशीलता से विचार कर रहा है और समाधान की दिशा में पहल की जाएगी।


जनता में आक्रोश और समर्थन

कटाव पीड़ितों के समर्थन में स्थानीय लोग, सामाजिक संगठन और युवा बड़ी संख्या में एकजुट हो रहे हैं। लोगों ने आशीष मंडल की पहल को “आवाज विहीनों की आवाज” बताया और प्रशासन से मांग की कि अब देरी न हो।


आशीष मंडल का अनशन यह दर्शाता है कि जब प्राकृतिक आपदा से प्रभावित लोग बार-बार अनदेखी का शिकार होते हैं, तो एक युवा नेतृत्व आगे आकर उनके लिए संघर्ष का प्रतीक बनता है। अब यह देखना अहम होगा कि प्रशासन कटाव पीड़ितों की बहुचर्चित मांगों को किस गंभीरता से हल करता है


 

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