गोपालगंज (बिहार), 10 जुलाई 2025:बिहार के गोपालगंज जिले से एक प्रेरणादायक और अनोखा मामला सामने आया है, जिसमें किशोर न्याय बोर्ड ने शराबबंदी कानून के उल्लंघन में पकड़े गए एक नाबालिग को जेल भेजने की बजाय सामाजिक और पर्यावरणीय दायित्व निभाने की सजा सुनाई है। इस फैसले की सामाजिक स्तर पर व्यापक सराहना हो रही है।
क्या है मामला?
यह घटना 13 अप्रैल 2025 की है, जब भोरे थाना क्षेत्र से पुलिस ने एक किशोर को 135 पीस देशी शराब और एक बाइक के साथ गिरफ्तार किया था। मामला बिहार मद्य निषेध एवं उत्पाद अधिनियम, 2016 के उल्लंघन का था। चूंकि आरोपी नाबालिग था, उसे किशोर न्याय बोर्ड के समक्ष प्रस्तुत किया गया।
‘सुधार का मौका दें’: किशोर की भावुक अपील
सुनवाई के दौरान किशोर ने अपने अपराध पर गंभीर पछतावा जताया और बोर्ड से माफी मांगते हुए खुद को सुधारने का एक अवसर देने की अपील की। उसने कहा कि वह समाज की मुख्यधारा में लौटना चाहता है और अपनी गलती का प्रायश्चित करना चाहता है।
कोर्ट का रचनात्मक फैसला: 30 पेड़ लगाने और देखभाल का आदेश
किशोर न्याय बोर्ड के प्रधान मजिस्ट्रेट नीलेश भारद्वाज ने किशोर की भावनाओं को समझते हुए उसे एक सुधारात्मक जिम्मेदारी दी। आदेश के अनुसार किशोर को:
- एक विद्यालय परिसर में 30 पेड़ लगाने होंगे
- और लगातार 30 दिनों तक उनकी देखभाल करनी होगी
- इस कार्य की निगरानी विद्यालय के प्रधानाध्यापक करेंगे और उसकी रिपोर्ट बोर्ड को सौंपी जाएगी।
‘सजा नहीं, सामाजिक पुनर्वास’: बोर्ड की मंशा
बोर्ड ने स्पष्ट किया कि यह आदेश सजा नहीं, बल्कि सामाजिक पुनर्वास का माध्यम है। इससे न केवल किशोर को अपनी गलती का एहसास होगा, बल्कि वह पर्यावरण और समाज के प्रति जागरूक नागरिक भी बनेगा।
“ऐसी पहल से हम भविष्य के नागरिकों में जिम्मेदारी और संवेदनशीलता का भाव जगा सकते हैं,”
— किशोर न्याय बोर्ड, गोपालगंज
बिहार में पूर्ण शराबबंदी कानून
गौरतलब है कि बिहार में अप्रैल 2016 से पूर्ण शराबबंदी लागू है। इसके तहत शराब का निर्माण, बिक्री, भंडारण, परिवहन और सेवन पूरी तरह प्रतिबंधित है। वयस्कों के लिए इसमें कठोर सजा और भारी जुर्माने का प्रावधान है, जबकि नाबालिगों के मामलों में किशोर न्याय अधिनियम के तहत अलग प्रक्रिया अपनाई जाती है।
समाज के लिए एक सकारात्मक संदेश
इस फैसले से यह स्पष्ट होता है कि हर गलती करने वाला अपराधी नहीं होता। यदि युवाओं को समय रहते सुधरने और समाज में योगदान देने का अवसर दिया जाए, तो वे रचनात्मक नागरिक बन सकते हैं। गोपालगंज का यह निर्णय कानून, करुणा और सुधार के बीच संतुलन की एक मिसाल बन गया है।


