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पटना में टाइम बम है गांधी सेतु, 15 साल में भी मरम्मत पूरी नहीं

वाराणसी में निर्माणाधीन पुल गिरने के बाद देशभर में बन रहे या पुराने पुलों को लेकर लोग चिंतित हैं. बिहार की राजधानी पटना के गांधी सेतु को लेकर भी लोग आशंकाओं से घिरे हैं. कभी एशिया में सबसे लंबा सड़क पुल होने का तमगा हासिल था पर आज उसे एक तरह का टाइम बम कहा जाता है. पुल की हालत ऐसी है कि यात्री भगवान का नाम लेकर गुजरते हैं और उस पार पहुंचने पर शुक्रिया अदा करते हैं.

 

क्या है इस पुल की अहमियत?

 

यह पुल पटना से पूरे उत्तर बिहार को जोड़ता है. साढ़े 6 किमी लंबा महात्मा गांधी सेतु 1982 में बना था. तब इस पर महज 81 करोड़ की लागत आई थी. तब यह एशिया का सबसे बड़ा पुल था. पर अब हजारों लोग डर और घंटों जाम के बीच इस पुल से यात्रा कर रहे हैं. यहां पुल कि इतनी जरूरत है कि एक साल पहले इसी समानांतर एक पुल बना. इसे दीघा सड़क पुल कहते हैं. पर दीघा पुल से बसों और दूसरे यात्री वाहनों के गुजरने की मनाही है. दीघा पुल से सिर्फ निजी चरपहिया गाड़ियां गुजर सकती हैं. इस हालत में बस, ऑटो, जीप जैसी सवारी गाड़ियां मजबूरन निर्माणाधीन पुल से गुजरते हैं.

 

एक दशक से हो रहा है निर्माण, पर अभी तक नहीं हुआ पूरा

 

पिछले एक दशक से गांधी सेतु के मरम्मत का काम चल रहा, पर अभी तक पूरा नहीं हुआ है. यह पुल प्री-स्ट्रेसिस टेक्नोलॉजी पर बना है. एक के बाद एक हुए कई समीक्षाओं में यह बात सामने आई कि ये उपयुक्त टेक्नोलॉजी नहीं थी. दूसरी बात यह कि पुल बनने के बाद इसका समुचित रख-रखाव नहीं हो पाया. पहली स्टडी 1998-99 में की गई थी, जब कुछ दरार नजर आने लगी थी. स्टडी स्तूप कंसल्‍टेंट्स ने किए. उसकी सिफारिशों के बाद 6-7 और स्टडी हो चुकी हैं. लोग बताते हैं कि पुल बनने के 13-14 साल बाद से ही समस्‍याएं शुरू हो गई थीं.

 

‘ये बिहार है, अधिकारी-नेता कान में रूई डालकर सोए हैं’

 

मरम्मत के लिए चार लेन वाले इस पुल के दो लेन को गिराया जा रहा है. अभी यहां से गुजरने वाले वाहनों का पूरा बोझ बाकी बचे दो लेनों पर है. पुल की मौजूदा स्थिति पर लगातार रिपोर्ट करने वाले स्थानीय पत्रकार आशीष झा का मानना है कि इस पुल पर कभी कोई बड़ी घटना हो सकती है और शायद इसी का इंतजार किया जा रहा है. aajtak.in से बात करते हुए वो कहते हैं, ‘देखिए…ये बिहार है. अधिकारी और नेता यहां तबतक कान में रूई देकर सोए रहते हैं जबतक कोई बड़ी घटना नहीं हो जाती. कोई बड़ा शोर नहीं होता. हाय-तौबा नहीं मचती. इस मामले में भी इसी का इंतजार किया जा रहा है. पुल की हालत ऐसी नहीं है कि इसपर से बसों को गुजारा जाए लेकिन हर दिन सवारियों से लदी कई बसें गुजरती हैं.’

 

‘लोग मौत का इंतजार कर रहे हैं’

 

आशीष आगे कहते हैं, ‘दुनिया में यह एक अकेला ऐसा इलाका है जहां लोग मौत का इंतज़ार कर रहे हैं. मैं कल ही उधर से आया हूं. पूल के पश्चिमी लेन का नब्बे प्रतिशत हिस्सा तोड़ दिया गया है. जो लेन बचा है और जिसके सहारे सवारियां आती-जाती हैं उसमें इतना उछाल आता है कि कलेजा कांप जाता है. किसी दिन यही उछाल नीचे आ जाएगा और हर तरफ कोहराम मच जाएगा.’

 

फेल रहा है पीपा पुल का विकल्प

 

ऐसा नहीं है कि प्रशासन ने वैकल्पिक रास्ता बनाने की कोशिश नहीं की. पुल के पश्चिम में दो और पूरब में दो पीपा पुल बनाए गए. बिना पूरी तैयारी के बनाए गए तीन पीपा पुलों के निर्माण में खर्च तो करोड़ों हो गए लेकिन काम नहीं हुआ. आशीष बताते हैं, ‘तीन पीपा पुल बनाए गए थे लेकिन तीन दिन भी उस पुल का सही से इस्तेमाल नहीं हुआ. कहां गए वो पीपा पुल उसका किसी को कोई अता-पता नहीं है. पीपा पुल उस जगह बनता है जहां पानी हो. यहां दस कदम पानी है और फिर बालू है ऐसे में यह कोई रास्ता था ही नहीं है लेकिन अधिकारियों को कुछ करना था सो उन्होंने कर दिया.’

 

खर्च हो रहे हैं करोड़ों, पर पूरा नहीं हो पा रहा है काम

 

पिछले 15 वर्षों में इसकी मरम्मत पर 125 करोड़ से अधिक रकम खर्च हो चुकी है. साल 2015 में पटना स्थित आरटीआई कार्यकर्ता अभिषेक ने सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय से बिहार में गंगा नदी पर निर्मित गांधी सेतु के मरम्मत पर हुए खर्च समेत अन्य जानकारी मांगी थी. आरटीआई के तहत प्राप्त जानकारी के अनुसार 2012 में पुल के कुछ अन्य खंभो के ऊपर मरम्मत कार्य के लिए 29.39 करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे और अब तक 16.47 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं. मरम्मत का कार्य अभी जारी है. साल 2010 में पुल की मरम्मत के लिए 23.81 करोड़ रुपये आवंटित किए गए और 22.52 करोड़ रुपये खर्च हुए. 2009 में 13.71 करोड़ रुपये आवंटित हुए और 11.27 करोड़ रुपये खर्च हुए. साल 2009 में ही अलग-अलग मदों में करीब 73 करोड़ रुपये आवंटित हुए और 64 करोड़ रुपये खर्च हुए. साल 2008 में गांधी सेतु की मरम्मत पर 13.39 करोड़ आवंटित हुए और 11.64 करोड़ रुपये खर्च हुए.

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