नोटबंदी से क्या सच में कैशलेस हुई इकोनॉमी? क्या कहते हैं 2 साल के आंकड़े

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 8 नवंबर, 2016 को नोटबंदी की घोषणा की थी. इस घोषणा के कई मकसद में से एक मकसद भारत को कैशलेस इकोनॉमी बनाना था. हालांकि नोटबंदी के दो साल बाद भी कैश किंग है. भारतीय रिजर्व बैंक के डेटा से ये बात साफ नजर आती है.


भारतीय रिजर्व बैंक की तरफ से मुहैया किए गए डेटा के मुताबिक 8 नवंबर, 2016 की रात को 17.01 लाख करोड़ कैश चलन में था. वहीं, 8 नवंबर, 2018 को 18.76 लाख करोड़ रुपये कैश चलन में है. इससे साफ जाहिर है कि कैश की डिमांड अभी भी कम नहीं हुई है और लोग आज भी कैश इस्तेमाल करना पसंद करते हैं.

साल दर साल की बात करें तो 2016 में चलन में मुद्रा की हिस्सेदारी 17.7 फीसदी की दर से बढ़ रही थी. लेकिन 2018 के बाद यह 22.2 फीसदी की दर से बढ़ी है. जो कि चिंताजनक है.


डिजिटल ट्रांजैक्शन में मिली थोड़ी सफलता
दूसरी तरफ, भले ही कैश फिर क‍िंग बना हो, लेक‍िन डिजिटल ट्रांजैक्शन में भी थोड़ी बढ़त देखने को मिली है. 2015-16 में एनईएफटी वॉल्यूम 1.25 लाख करोड़ रुपये का था. 2017-18 में यह 50 फीसदी बढ़ा है. इस बढ़त के साथ यह 1.95 लाख करोड़ के आंकड़े पर पहुंच गया है.
वहीं, आईएमपीएस ट्रांजैक्शन में भी 5 गुना की बढ़ोतरी हुई है. यह 2015-16 के दौरान जहां 22000 करोड़ रुपये था. अब यह बढ़कर 1 लाख करोड़ रुपये के पार चला गया है. डेबिट, क्रेडिट और प्रीपेड इंस्ट्रूमेंट्स व वॉलेट्स की बात करें तो इनमें 236 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है. पहले इनके जरिये लेन-देन 4.48 लाख करोड़ रुपये का हुआ था. यह अब बढ़कर 10.6 लाख करोड़ रुपये हो गया है.
आरटीजीएस ट्रांजैक्शन में भी 41 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है. यह 824 लाख करोड़ से बढ़कर 1167 लाख करोड़ पर पहुंच गया है.
इस तरह नोटबंदी के बाद लोगों के बीच डिजिटल ट्रांजैक्शन को लेकर जागरूकता फैली. इसका परिणाम ही है कि नोटबंदी के 2 साल बाद कैशलेस लेन-देन में काफी बढ़ोतरी हुई है. हालांकि कैश भी उसी रफ्तार से बढ़ रहा है.

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